चंपावत की निर्माणाधीन जिला जेल भवन की चहारदीवार।
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चंपावत। जिले में पिछले आठ साल से 2.22 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद से निर्माणाधीन जेल भवन का काम बंद है। बजट की कमी से परेशान प्रशासन की मुसीबत स्थानीय लोगों ने जेल को दूसरी जगह बनाने की मांग करके और बढ़ा दी है। विधायक भी स्थानीय लोगों की इस मांग के पक्ष में हैं। दुविधा में फंसा प्रशासन तय नहीं कर पा रहा है कि क्या करें क्योंकि इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बाद दूसरी जगह जेल का निर्माण कराना काफी कठिन है। हालांकि जेल के नाम पर अब तक सिर्फ चहारदीवारी ही बन सकी है।
चंपावत जिला जेल का जून 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी ने शिलान्यास किया था। गोरलचौड़ मैदान के पास शुरू जेल भवन में चहारदीवारी पर 1.22 करोड़ रुपये के अलावा एक करोड़ रुपये जमीन का मुआवजा देने में खर्च हो चुके हैं। लेकिन 2012 से धन नहीं मिलने से काम ठप है। जेल भवन के लिए 15 करोड़ रुपये बजट की शासन से मांग की गई थी, लेकिन यह रकम मिली नहीं। जेल भवन तो लटका है। इधर, जेल की जगह को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। चंपावत विकास एवं संघर्ष समिति का कहना है कि जेल का नगर के बीच होना ठीक नहीं है। समिति के संयोजक हरेंद्र बोरा सहित तमाम लोगों ने जेल की जगह को बदलने और इस स्थान का दूसरे रूप में उपयोग करने की मांग की है।
लोहाघाट बंदीगृह की चार बैरकों में हैं 55 कैदी
जिला जेल नहीं होने से यहां के सामान्य कैदियों को लोहाघाट बंदीगृह में रखा जाता है। चार बैरक वाले लोहाघाट बंदीगृह में इस वक्त सात महिलाओं सहित कुल 55 कैदी हैं। इसके अलावा शातिर कैदियों को अल्मोड़ा या दूसरी जगह जेल में भेजा जाता है, जिस पर पुलिस को अतिरिक्त पुलिस बल और मोटी रकम खर्च होती है।
गोरलचौड़ मैदान के पास जेल के भवन को लेकर लोगों को आपत्ति को देखते हुए जेल भवन के लिए नई जगह भूमि की तलाश को कहा जाएगा और इस अधूरे भवन का उपयोग रैनबसेरा, बारातघर या किसी अन्य रूप में कराए जाने पर विचार किया जाएगा।
कैलाश गहतोड़ी, विधायक,
चंपावत।
जिला जेल भवन की मौजूदा स्थिति की रिपोर्ट शासन को भेजी गई है। भूमि के मुआवजे और जेल भवन की चहारदीवारी के निर्माण तक 2.22 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। ऐसे में जेल के निर्माण को कहीं अन्य कराया जाना औचित्यपूर्ण नहीं है।
सुरेंद्र नारायण पांडेय,
डीएम, चंपावत।