चंपावत। चंपावत जिले की प्यास बुझ पाना फिलहाल तो मुमकिन नहीं लगता, अगर मंजूर योजना में नियमित रूप से काम हुआ, तो भी इसमें दो वर्ष लग जाएंगे। फिलहाल यहां के लोगों को बमुश्किल एक-तिहाई पानी से गुजारा करना पड़ रहा है। वैसे पानी की कमी का आलम जिले के सभी शहरों में है। लिहाजा गांव ही नहीं शहरों में भी लोग नौले और दूसरे साधनों पर आश्रित हैं।
जिले के तीन बड़े शहरों में से किसी में भी जरूरत के हिसाब से पानी की उपलब्धता नहीं है। लोगों को लंबा फासला तय कर पानी ढोने को मजबूर होना पड़ रहा है। जल संस्थान के सहायक अभियंता प्रेमजी श्रीवास्तव ने बताया कि जिले के तीन प्रमुख शहरों में मांग के सापेक्ष 47.54 प्रतिशत पानी की ही उपलब्धता हो पा रही है। जिले में योजनाओं की कमी नहीं है। 288 ग्रामीण योजनाओं के अलावा चंपावत, लोहाघाट, टनकपुर की नगरीय योजनाएं हैं। इनसे कुल 2.9 एमएलडी (मिलियन लीटर डेली) पानी मिल रहा है, जबकि जरूरत 6.1 एमएलडी की है, जो मात्र 47.54 प्रतिशत है।
नगरीय क्षेत्र मांग (एमएलडी में) मिल रहा पानी उपलब्धता प्रतिशत
चंपावत 1.48 0.48 32.43
लोहाघाट 1.62 0.72 44.44
टनकपुर 3.00 1.70 56.60
चंपावत। 2014 में मंजूर पेयजल पुनर्गठन योजना का शासनादेश 2015 में हुआ। तभी धन भी रिलीज होने पर 2016 में अगस्त बाद काम की शुरुआत हुई। चंपावत क्षेत्र में पेयजल की कमी को दूर करने के लिए 30.88 करोड़ रुपये की इस योजना के लिए मात्र एक करोड़ रुपये मिले हैं।
क्वैराला नदी से बनने वाली लिफ्ट पेयजल योजना का लक्ष्य चंपावत समेत आसपास के 29 हजार लोगों को 30 वर्षों तक पेयजल आपूर्ति करना है। अभी नगर क्षेत्र की आबादी करीब 11 हजार है। गधेरे से 10 किमी तक पांच पंपिंग स्टेशन मंडेला, तोला, थ्वालकीधार, किसकोट, हनुमान मंदिर में बनाए जाएंगे।
साफ पानी के लिए स्रोत पर ही फिल्ट्रेशन व्यवस्था होगी। हनुमान मंदिर (हिंग्लादेवी मंदिर) के करीब बनने वाले 1100 किलोलीटर के टैंक से पानी की आपूर्ति होगी। बिजली की व्यवस्था के लिए अलग से फीडर बनेगा लेकिन काम की गति धीमी है। जल निगम के अधिशासी अभियंता एचसी भारती का कहना है कि धन की मांग की गई है। रुपये मिलते ही तेजी से काम आगे बढ़ेगा।