इस बार रसीले काफल को तरसेंगे लोग
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इस बार पहाड़ में रसीले काफल कम नजर आएंगे। मौसम की तपिश ने पेयजल ही नहीं, पहाड़ के फलों पर भी मार की है। अप्रैल शुरू हो गया लेकिन अभी तक जंगल का यह काफल का दाना भी कायदे से नहीं निकल सका है। और जो निकला है, वो भी रसीला है।
चंपावत जिले के पर्वतीय हिस्सों में तकरीबन डेढ़ महीने काफल की धूम रहती है। यहां आने वाले पर्यटकों के बीच भी यह फल बेहद लोकप्रिय है। काफल में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में मिलता है। आमतौर पर अप्रैल के तीसरे हफ्ते से काफल बाजार में आता रहा है। पर इस बार काफल की स्थिति बेहद खराब है। अभी तक काफल का दाना ही कायदे से नहीं निकला है। और निकले दानों में कतई रस नहीं है। जिले में मुड़ियानी, बनलेख, धौन, स्वांला, मानेश्वर, सिप्टी, नरियालगांव सहित ढेरों गांवों में काफल बहुतायात में होता है।
बच्चों का रोजगार भी हो सकेगा प्रभावित
चंपावत जिले में ही काफल के सीजन में 15 लाख रुपये से अधिक का काफल बिकता रहा है। शुरुआत में काफल 150 रुपये किलोग्राम तक बिकता रहा है। बाद में इसकी कीमत 50 रुपये तक गिर जाती है। काफल बेंचने के लिए कोई मंडी नहीं है। फल के कुछ ठेलों को छोड़ गांवों के अधिकांश बच्चे सड़क के किनारे काफल बेंचते हैं। जिससे एक-एक बच्चा पांच हजार रुपये से अधिक कमा लेता है। पर इस बार उनकी आमदनी भी प्रभावित हो सकती है।
काफल का फल अप्रैल तीसरे हफ्ते से शुरू होकर जून के शुरू तक पैदा होता है। इस बार काफल की ग्रोथ बेहद ढीलीढाली है। अधिकांश पेड़ों में काफल का दाना ठीक से नहीं निकल सका है। और जो निकला भी है, उसमें रस नहीं है। नमी की कमी की वजह से काफल में रस नहीं है। एचसी तिवारी जिला उद्यान अधिकारी, चंपावत।