चंपावत। चंद और कत्यूरी राजवंश की राजधानी रहे चंपावत में चौबे होली गायन की परंपरा अतीत के पन्नों में समा गई है। चौबे होली कुमाऊं के चंद राजवंश की आठ सदी तक राजधानी रही चंपावत की धरोहर रही है। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी इसे संरक्षित नहीं किया जा सका। कई बार आई अड़चनों के बाद बीच-बीच में चौबे होली का गायन जरूर हुआ, लेकिन 2014 से इस पर पूर्ण विराम लग गया।
चौबे होली को चाराल क्षेत्र के लोग राजवंश के सम्मान में गाते थे। चौबे होली चंद राजवंश की सांस्कृतिक विरासत की चमकदार परंपरा थी लेकिन एक दशक से यह शानदार परंपरा अतीत का हिस्सा बन गई है। राजवंश के सम्मान में होने वाली इस होली का गायन तड़ागी, बोरा, कार्की और चौधरी जाति के लोग राज दरबार में करते थे।
1980 के दशक तक चौबे होली पूरे उत्कर्ष पर थी। होली के जानकार भगवत प्रसाद का कहना है कि चौबे होली में शराब के बढ़ते प्रचलन के साथ ही संस्कृति विभाग की उदासीनता से प्रोत्साहन न मिलने को यह परंपरा हाशिए में चली गई। साहित्यकार सुभाष जोशी के अनुसार शराब के बढ़ते चलन, सांस्कृतिक परंपराओं की अनदेखी और मोबाइल क्रांति चौबे होली के ठहराव का प्रमुख कारण हैं। संवाद
राजा बलि के द्वार मची होली का होता था गायन
चंपावत। इतिहासकार देवेंद्र ओली के अनुसार चौबे होली का अर्थ ऐतिहासिक चंपावत नगरी के चारों तरफ यानी चाराल क्षेत्र के चैकुनी बोरा, खर्ककार्की, ढकना, चौकी, पल्सों, मादली, कुलेठी आदि गांवों से आने वाले होल्यारों की टीम से है। राजबुंगा किला परिसर जिसमें वर्तमान में तहसील का संचालन हो रहा है। यहां होल्यारों की टीम राजा बलि के द्वार मची होली गीत का गायन करती थी। संवाद