नेपाल सीमा से लगे गुमदेश के ऐतिहासिक चैतोला मेला यहां अद्भुत आस्था का समागम है। राम नवमी से शुरू होने वाले मेले को लेकर लोगों में गजब का उत्साह रहता है। इस मेले में चमू देव को पापड़ का प्रसाद चढ़ाया जाता है। यहां के सात गांवों में धौनी परिवारों द्वारा चावल का विशेष किस्म का प्रसाद तैयार किया जाता है।
गोविंद धौनी, लक्ष्मण धामी, गुमान सिंह प्रथोली बताते हैं कि सीलिंग, चौपता, नेवल टुकरा, बसकुनी, सिरकोट, जाख व जिंडी गांवों में रहने वाले धौनी परिवारों द्वारा चमू देवता को अर्पित किए जाने वाले प्रसाद की सामग्री प्रथम नवरात्र से एकत्र की जाती है। छठे, सातवें व आठवें नवरात्र के दौरान पड़ने वाले शुभ दिन को शुद्धता के साथ पापड़ बनाए जाते हैं। चमू देवता को पापड़ का प्रसाद चढ़ाने के बाद ही त्यौहार में बने व्यंजन किसी को दिए जाते हैं। मेले की एक खूबी यह भी है कि इस दौरान यहां कोई भी होटल नहीं खुलता है। मेले में आने वाले परिचित-अपरिचित लोगों को ग्रामीण अपने घरों में भोजन कराते हैं।
चमू देव ने किया था अत्याचारी दैत्य का वध
लोहाघाट। मान्यता है कि उत्तराखंड प्रवास के दौरान पांडवों ने पंचेश्वर की त्रिवेणी में स्नान कर शिव मंदिर बनाने की इच्छा जताई, मगर पांडवों ने चारों दिशाओं में कई बाण छोड़े, पर कोई बाण नहीं रुका। तब कुंती ने आंचल में एक बाण रोक दिया और इस स्थान का नाम रूकमीचौड़ (चमदेवल) रखा। यहां पर शिव शक्ति की स्थापना की गई। कत्यूर राजा के बाद शिव के अनन्य भक्त चमू ने राज किया। चमू सात भाई थे।पंडित शंकरदत्त पांडेय बताते हैं कि आज भी चमदेवल, निडिल, पंचेश्वर, नेपाल के धामकुड़ी, संतोला में चमू देव के मंदिर में स्थापित हैं। इन्हीं चमू देव के समय महाबली दैत्य बकासुर का आतंक था, जो रूकमीचौड़ पहुंच कहर ढाया। दैत्य के आतंक से रोजाना एक नर बलि होने लगी। इकलौते पौत्र की बारी आने पर कोकिला नामक वृद्धा ने चमू देवता के सामने नत मस्तक होकर पौत्र की रक्षा की विनती की। वृद्धा की पुकार पर चमू देव ने केदार के बलशाली पुत्रों लाटा, भराड़ा, रुद्र की मदद से दैत्य का वध कर दिया। इससे चमू के पराक्रम व न्याय की ख्याति चारों तरफ फैल गई। जिन्हें लोग चौखाम कहने लगे। तबसे चैत्रीय नवरात्र में यहां मेला लगता है।
तय रहता है जत्थों व डोलों का परिक्रमा समय
रामनवमी के अगले दिन मुख्य मेले (26 मार्च) को होने वाली मंदिर की परिक्रमा करने वाले जत्थों, डोलों के प्रवेश, परिक्रमा और विसर्जन का समय निर्धारित रहता है। सात अलग-अलग स्थानों से आने वाले जत्थों के लिए मंदिर की परिक्रमा और प्रवेश के लिए 20-20 मिनट का समय तय है। पहला जत्था 2.40 बजे से प्रवेश करता है, जबकि सातवां जत्था 5.41 बजे मंदिर में आता है।
प्रवासियों को भी रहता है मेले का इंतजार
यहां के बाहर रहने वाले लोग चैतोला मेले का बेसब्री से इंतजार करते हैं। अमेरिका, इंग्लैंड, हांगकांग, दुबई आदि जगहों में नौकरी-पेशा करने वालों के अलावा भारत के विभिन्न स्थानों में सेवारत प्रवासी यहां जरूर पहुंचते हैं। लोगों का कहना है कि मेले के दौरान चौखाम बाबा का आशीर्वाद लेकर वह साल भर शुकून से अपना काम कर पाते हैं।
मेले का श्रीगणेश कल
25 मार्च को शुरू होने वाले मेले का उद्घाटन ब्लाक प्रमुख योगेश मेहता करेंगे। इसी दिन चमू देवता की जमानी (डोला) को मड़ गांव ले जाया जाएगा। रात भर श्रद्धालु विशेष पूजा-अर्चना करेंगे। दूसरे दिन की शोभा यात्रा निकाली जाएगी। जिसमें विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में लोग जत्थों के रूप में शामिल होंगे। तीसरे दिन के मेले में मुख्य रूप से व्यापारिक गतिविधियां होंगी।