चंपावत। देवभूमि के विभिन्न धाम पहाड़ के लोगों की आस्था के प्रतीक है। यही आस्था की ताकत अब धीरे-धीरे चंपावत जिले के वन पंचायतों के जंगलों को बचाने में मददगार बन रही है। जिले के जंगलों को सुरक्षित रखने के लिए वन पंचायतें देवी-देवताओं का आसरा ले रही है। पिछले पांच साल में सात वन पंचायतों को देवी को अर्पित कर बचाया गया है। वनों को ईश्वर के हवाले करने से अवैध कटान और अन्य तरह के नुकसान कम होने के साथ ही जंगल भी फले-फूले हैं।
चंपावत वन प्रभाग की 568 वन पंचायतों में कुल 36780 हेक्टेयर पंचायती जंगल हैं। खर्ककार्की, सेलाखोला, छतकोट, बाजरीकोट, चौकी, कोट अमोड़ी, तल्लादेश के वनों को देवी देवताओं को समर्पित किया गया है। मां हिंग्लादेवी, इंसाफ के देव गोरलदेव, नागनाथ देव, भगवती देवी को चढ़ाने के बाद ये जंगल फल-फूल रहे हैं। ग्रामीणों ने जंगल से किसी भी प्रकार की वनस्पति का कटान नहीं करने की प्रतिज्ञा ली। सिर्फ पेड़ से गिरने वाली सूखी पत्तियां और लकडिय़ों का ही उपयोग किया जा सकता है।
पंचायती वनों को बचाने के लिए मार्च 2014 से देवी-देवताओं को समर्पित करने की परंपरा शुरू हुई है।
कोट
पहाड़ लोग आस्थावान हैं। ऐसे में जंगलों को देवी-देवताओं को चढ़ाने से नुकसान कम होता है। देव स्थल में जंगलों को अर्पित करने के लिए पंचायत प्रेरित करेगा।
दान सिंह कठायत, अध्यक्ष, सरपंच संगठन, चंपावत।
कोट
जंगलों को देवी-देवताओं को समर्पित करने का काम वन विभाग नहीं करता है। जिन वन पंचायतों ने अपने स्तर से ये पहल की है, उसके अच्छे नतीजे निकले हैं।
आरसी कांडपाल, डीएफओ, चंपावत।