वीरान हो चुके जिले की सीमावर्ती गांवों के बंजर खेतों में चाय के बागान लहलहाएंगे। उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड की ओर से जिले में चाय उत्पादन बढ़ाने के साथ ही चाय के बागान भी विकसित किए जा रहे हैं, जिसके तहत सीमांत क्षेत्र के मंच, दुबडजैनल, कफल्टा, रूईयां, खोकिया, गुरखोली गूंठ आदि गांवों में बंजर हो चुके खेतों में चाय के बागान विकसित करने की तैयारी शुरू हो गई है।
पहले चरण में ग्रामीणों की दो सौ नाली भूमि में चाय के पौधे लगाए जाएंगे, जिसके लिए ग्रामीणों से सात साल के लिए बंजर जमीन लीज पर ली जा रही है। चाय बागान के पूर्ण विकसित होने पर उसका मालिकाना हक संबंधित ग्रामीणों को दे दिया जाएगा।
बता दें कि बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण सीमांत क्षेत्र के कई गांव वीरान होते जा रहे हैं। चाय विकास बोर्ड की यह पहल सीमांत क्षेत्र से पलायन रोकने में भी मददगार साबित हो सकती है। चाय विकास बोर्ड के प्रबंधक डेसमंड के अनुसार जिले में 200 हेक्टेयर क्षेत्रफल में चाय का सफलतापूर्वक उत्पादन होने लगा है। अब सीमांत गांवों में भी चाय बागान विकसित किए जा रहे हैं। 200 नाली बंजर भूमि को महिलाओं के सहयोग से चाय की पौध लगाने के उपयुक्त बना लिया गया है। जल्द ही प्लांटेशन का कार्य शुरू किया जाएगा।
ग्रीन लीफ ने दी चंपावत को नई पहचान
जिले की वर्तमान पहचान प्रमुख चाय उत्पादक क्षेत्र के रूप में भी होने लगी है। अलग राज्य बनने के बाद से चंपावत क्षेत्र ने ग्रीन लीफ (हरी पत्ती) चाय के उत्पादन में विशिष्ट पहचान बनाने में कामयाबी हासिल की है। अब यहां की ग्रीन लीफ विदेशों को भी एक्सपोर्ट की जाती है। चाय विकास बोर्ड की ओर से जिले में दो सौ हेक्टेयर क्षेत्रफल में विकसित किए जा चुके चाय बागानों को पर्यटन ग्रिड से जोड़ने की तैयारी भी शुरू हो गई है, जिसके तहत जिले में आने वाले पर्यटकों को सिलंटाक, क्षीणापानी, फूलगढ़ी, सिमल्टा, लमाई, नरसिंहडांडा, मुडियानी आदि चाय बागानों का भ्रमण कराया जाएगा।
साल दर साल बढ़ रहा उत्पादन
वर्ष चाय उत्पादन (किग्रा)
2009-10 19400
2010-11 28800
2011-12 35000
2012-13 54000
2013-14 77000
2014-15 87430