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तो उत्तराखंड में क्यों मुमकिन नहीं शराबबंदी...

Fri, 27 Nov 2015 10:32 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत
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देवभूमि उत्तराखंड में शराब का खूब जोर है। छोटे से चंपावत जिले में ही 26.55 करोड़ रुपये का राजस्व एक वर्ष में मिल रहा है। करीब आठ हजार बोतलों की औसतन रोजाना बिक्री हो रही है। सालभर में 130 करोड़ रुपये से अधिक की शराब की बिक्री होती है। चंपावत जिले में इस वित्तीय वर्ष में शराब की एक नई दुकान खुली, जिससे यहां शराब की दुकान बढ़कर 16 हो गई है। दारू यहां खूब इफरात से मिल रही है, मगर दवा का कोई खैरख्वाह नहीं।
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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 1 अप्रैल 2016 से बिहार में शराबबंदी का एलान किया है। बिहार का यह कदम उत्तराखंड के लिए क्यों पथ प्रदर्शक नहीं बन सकता है? बिहार को शराब से हर साल लगभग चार हजार करोड़ रुपये का राजस्व मिलता है। इस पहाड़ी राज्य में तो शराब से इससे आधा भी राजस्व प्राप्त नहीं होता, लेकिन प्रदेश के युवाओं को नशे के मकड़जाल में जरूर धकेल रहा है। बता दें कि चंपावत जिला वैसे भी शराब विरोधी आंदोलन के लिए मशहूर रहा है। 2000-01 में शराब की दो दुकानों को आंदोलन की ताकत ने निरस्त करवा दिया था, इसे लेकर महिलाओं में भी खूब उत्साह है।

तो बच सकेगी नई पीढ़ी
रेखा बोहरा, कलावती, हेमा जोशी, पोपली देवी, रेनु पंत, पूजा देवी जैसी ढेरों महिलाओं का कहना है कि शराब ने उत्तराखंड खासकर पहाड़ को गर्त में धकेल दिया है। चंपावत सहित पहाड़ के अधिकांश हिस्सों में नशाखोरी बड़ी बीमारी है। बड़ी संख्या में युवा पीढ़ी इसकी चपेट में है। शराब ने पहाड़ के दूरदराज के गांवों के लोगों को नशाखोरी के आगोश में धकेल दिया है। उनकी रचनात्मकता और ऊर्जा गलत रास्ते पर जा रही है। इन महिलाओं का कहना है कि शराब ने पारिवारिक कलह से लेकर समाज में फसाद तक कर रही है। पहाड़ के नौजवान पुलिस और फौज में बहुतायत में भर्ती होते थे लेकिन शराब ने इस पर भी ब्रेक लगाया है। शराबबंदी से युवा और नई पीढ़ी नशे की चपेट में आने से बच सकती है। महिलाओं का कहना है कि शराबबंदी को कठोरता से क्रियान्वित कर उत्तराखंड को नशामुक्त बनाने की पहल की जा सकती है।
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