लोहाघाट डिपो की बसें आए दिन रास्तों पर खराब होती रहती हैं। मानक पूरे कर चुकी बसों को मैदानी क्षेत्रों के बजाय पहाड़ में दौड़ाया जा रहा है। संवाद टीम ने बसों की स्थिति को लेकर पड़ताल की। रोडवेज स्टेशन चंपावत से 11:41 बजे लोहाघाट डिपो की बस यूके 07पीए 2991 में यात्रियों के साथ सफर कर उनसे बात की। यात्रियों कहना था कि पहाड़ में लोग रोडवेज की बसों में सफर करना पसंद करते हैं, लेकिन बसों की हालत अच्छी नहीं है। सीटें खराब हैं। फर्स्ट बॉक्स भी कई बसों में खराब रहता है।
शुरुआत में जब बस आती है तो पूरा ध्यान रखा जाता है, लेकिन समय के साथ बसों की हालत दयनीय हो जाती है। उन पर ठीक से काम भी नहीं होता है। कौन सी बस कहां पर खराब हो जाए कहा नहीं जा सकता है। सब भगवान भरोसे हैं।
यात्रियों ने कहा कि बसों की मरम्मत होती है, लेकिन इनकी सीटों को नहीं। इस पर भी काम करने की जरूरत है। 42 सीटर बस में करीब 25 यात्री शामिल थे। इसमें से कुछ ने खुलकर बसों की बदहाल स्थिति को लेकर बात की।
ज्यादातर यात्री टनकपुर की ओर जा रहे थे। बनलेख तक का आठ किमी सफर तय करने के दौरान परिचालक नितिन कुमार, चालक सुरेश आर्या ने बताया कि उन्हें एक ही बस लगातार नहीं मिलती है। गनीमत रही कि बस खराब नहीं हुई। डिपो से उन्हें अलग-अलग बसें मिलती रहती हैं।
रोडवेज की बसें जो मानक पूरे कर चुकी हैं, उनका संचालन नहीं करना चाहिए। कौन सी बस कहां खराब हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है। अगर बस खराब नहीं हुई तो समय से पहुंचना आसान होता। वरना कई बार बस खराब होने पर घंटों इंतजार करना पड़ता है।
- दीवान सिंह, पूर्व सैनिक, यात्री
पहाड़ में चलने वाली बसें अच्छी होनी चाहिए। इस बात का ध्यान सरकार को रखना चाहिए। बस में सवार चालक परिचालकों का व्यवहार बुजुर्ग यात्रियों लिए सौहार्द पूर्ण होना चाहिए।
राज्य की बसों की हालत बेहद खराब है। मानकों को ताक पर रखकर बसों का संचालन कर यात्रियों की जान को जोखिम में डाला जा रहा है। हिमाचल की बसों के तरह यहां की बस होनी चाहिए।
-हिमांशु, यात्री।
रोडवेज डिपो की बसें बदहाल हैं। इन बसों में अधिकतर यात्री सफर करते हैं। पहाड़ में चलने वाली मानक पूरे होने के बाद भी दौड़ाई जाती है, जो सही नहीं है। पहाड़ की जनता को यातायात की बेहतर सुविधा दी जानी चाहिए।