चंपावत में मिट्टी के दिए बेचता टनकपुर का आठवीं का छात्र मनीष।
- फोटो : CHAMPAWAT
चंपावत। कनक, ममता, रश्मि, मधु, मधुकर सहित कई बच्चे कोरोना की वजह से इस साल मार्च से स्कूल से दूर है। आठवीं तक के ये छात्र-छात्राएं बीते आठ महीने से घर पर ही हैं। न स्कूल और न खेल का मैदान। निजी स्कूल में पढ़ने वाले ये बच्चे बताते हैं कि उनकी ऑनलाइन पढ़ाई तो हो रही है, लेकिन कक्षा में जितना सीखने को मिलता था, उतना इस वक्त नहीं मिल रहा है। ऑनलाइन पढ़ाई में सवाल पूछने में उलझन होती है। नेटवर्क की अपनी दिक्कतें हैं। अकेलापन कचोटता है। घर में रहने पर बस टीवी देखने के अलावा और कुछ नहीं कर पाते हैं।
इधर जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विवेक सिंह कहते हैं कि बच्चे सामान्य रूप से बंधकर रहना नहीं चाहते। ये उनकी नैसर्गिक प्रवृत्ति नहीं है। उन्मुक्तता उनकी प्रवृति है। लेकिन लॉकडाउन की वजह से बाहरी गतिविधियां प्रभावित हुई है। इसका असर उनकी स्वाभाविक गतिविधियों पर पड़ता है। इससे बचने के लिए अभिभावक अपने बच्चों को योग, बागवानी करने के अलावा अन्य सामूहिक गतिविधियों पर जोर दिया जाना चाहिए।
75 किमी दूर दीये बेचने आया 13 साल का मनीष
चंपावत। धनतेरस के दिन जगह-जगह उल्लास और उमंग है। छोटे बच्चों से लेकर बड़े - बुजुर्ग हर कहीं जोश है। पर्व में खरीद को लेकर होड़ मची है, लेकिन कुछ जगह ऐसे छोटे बच्चे भी हैं, जो उल्लास के बजाय रोजगार के लिए दूरदराज से यहां पहुंचे हैं। 75 किमी दूर टनकपुर से आठवीं का छात्र मनीष भी उनमें से एक है।
अपने चाचा राजेश कुमार के साथ आया 13 साल का मनीष यहां स्टेशन रोड के किनारे मिट्टी के दीपक, गुल्लक और अन्य सामग्री को बेच रहा है। मनीष बताता है कि उसके लिए अधिक से अधिक मिट्टी की सामग्री बेचना ही पर्व का उल्लास है। इसमें उसकी और उसके परिवार की खुशी है। परिवार की माली हालत ठीक नहीं होने से 2019 से वह यहां आकर इस काम को कर रहा है। साथ ही वह पूरी शिद्दत से पढ़ाई भी करता है।