चंद वंश के शासकों की राजधानी रही चंपानगरी को काली कुमाऊं की सांस्कृतिक नगरी होने का गौरव भी हासिल है। नौ वर्ष पूर्व फिर से शुरू की गई नंदाष्टमी महोत्सव की परंपरा यहां की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में मददगार साबित हो रही है। चंपावत में नंदाष्टमी महोत्सव इस साल 9वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। लोगों का मानना है कि नंदाष्टमी महोत्सव का आयोजन जिले की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देेने में मील का पत्थर साबित हो रहा है।
मां नंदा चंद राजाओं के साथ ही कुमाऊं की कुल देवी भी मानी जाती हैं। वर्ष 1563 के बाद चंपावत नगर वर्ष 2007 में नंदाष्टमी मेले का गवाह बना। वर्ष 1563 वह साल है, जब चंद राजवंश की राजधानी चंपावत से अल्मोड़ा शिफ्ट हुई थी। वर्ष 700 में चंद वंश की नींव डालने वाले सोम चंद से लेकर 1543 तक हुकूमत चलाने वाले भीष्म चंद तक की राजधानी चंपावत थी। बालो कल्याण चंद ने वर्ष 1563 में राजधानी को अल्मोड़ा बदला था और 1563 तक ही चंपावत में नंदाष्टमी मेला होता रहा। वर्तमान में यह मेला अल्मोड़ा में धूमधाम से मनाया जाता है। पूर्व सांसद केसी बाबा और स्थानीय युवकों की पहल पर चंपावत में 444 साल बाद 2007 में नंदाष्टमी की परंपरा को पुनर्जीवित किया गया।
वेदी निर्माण और झांकियों से आज होगा शुभारंभ
जिला मुख्यालय में नंदा-सुनंदा महोत्सव का शुभारंभ 18 सितंबर को गणेश पूजन और वेदी निर्माण के साथ होगा। इसके अलावा महिलाओं की ओर से कलश यात्रा निकाली जाएगी। सुबह साढ़े दस बजे से छोलिया नर्तक दल और स्कूली बच्चों की ओर से झांकियां निकाली जाएंगी। पंडित दीपक कुलेठा, गिरीश कलौनी की ओर से वेदी निर्माण और अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाएंगे। सायं आठ बजे से रामलीला मंच में सांस्कृतिक संध्या आयोजित की जाएगी।
महोत्सव के लिए सजा बालेश्वर मंदिर समूह
नंदा-सुनंदा महोत्सव के आयोजन के लिए जिला मुख्यालय के मध्य में स्थित बालेश्वर मंदिर समूह को आकर्षक तरीके से सजाया गया है। बालेश्वर मंदिर परिसर में ही चंद शासकों की कुलदेवी नंदा-सुनंदा सहित कई अन्य देवी-देवताओं के मंदिर भी स्थित हैं, जहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना होती है।
उत्कृष्ट शिल्पकला बनी बालेश्वर मंदिर की पहचान
अजंता एवं ऐलोरा की गुफाओं में उकेरी गई शिल्पकला की तरह ही पत्थरों में की गई सुंदर नक्काशी और उत्कृष्ट शिल्पकला बालेश्वर मंदिर समूह की पहचान बनी है। मंदिर निर्माण में प्रयुक्त किए गए पत्थरों में देवी-देवताओं, जानवरों सहित कई तरह की आकृतियां उकेरी गई हैं। इतिहासकार देवेंद्र ओली कहते हैं कि बालेश्वर मंदिर समूह की नक्काशी खजुराहो शैली की है, जो अजंता-ऐलोरा की शिल्प शैली से काफी मेल खाता है।