चंपावत। उत्तराखंड देवभूमि है लेकिन इसी देवभूमि में देववाणी को विस्तार नहीं मिल पा रहा है। देववाणी संस्कृत को जन-जन की वाणी बनाना मुश्किल हो रहा है। उत्तराखंड के हर जिले में एक-एक आदर्श संस्कृत गांव बनाने की कवायद में भी देरी हो रही है। दो साल में इन गांवों को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है।
देववाणी को जन-जन की वाणी बनाने की कवायद देवभूमि में साकार नहीं हो पा रही है। उत्तराखंड की दूसरी राजभाषा संस्कृत को आम बोलचाल की भाषा बनाने की पहल सार्थक नहीं हो सकी है। उत्तराखंड संस्कृत अकादमी ने दो साल पहले हर जिले में एक-एक गांव को संस्कृत गांव के रूप में चयनित किया था लेकिन अब इन गांवों को खारिज कर दिया गया है। इससे संस्कृत शिक्षा विभाग की दो साल पहले शुरू की गई पहल विफल हो गई है। प्रदेश के सभी 13 जिलों में एक-एक गांव के चयन के लिए डीएम की अध्यक्षता में जिला स्तरीय समिति बनाई गई हैं। इस समिति में मुख्य शिक्षाधिकारी सदस्य और संस्कृत विभाग के सहायक निदेशक सदस्य सचिव होंगे।
संस्कृत भाषा सिखाएंगे संस्कृत गांव
चंपावत। आदर्श संस्कृत गांवों का उद्देश्य संस्कृत को लोकप्रिय बनाना है। लोगों को संस्कृत भाषा में बोलने, लिखने और व्यवहार में उपयोग की जानकारी दी जाएगी लेकिन न तो संस्कृत गांवों का चयन हो सका और न ही इन गांवों में संस्कृत भवन निर्माण या प्रशिक्षक और सहायक प्रशिक्षक तैनात किए जा सके।
पहले चयनित हुए इन संस्कृत गांवों को किया गया निरस्त
हरिद्वार: मुडियाकि, उत्तरकाशी: जसपुर, चमोली: रतूड़ा, रुद्रप्रयाग: जैली, टिहरी गढ़वाल: बनाली, देहरादून: रामनगर डांडा, पौड़ी: फलस्वाड़ी, पिथौरागढ़: उर्ग, अल्मोड़ा: जागेश्वर, नैनीताल: मल्ली पोखरी, बागेश्वर: दाडि़मठौक, चंपावत: खर्ककार्की, ऊधमसिंहनगर: गूलरभोज।
प्रदेश के हर जिले में एक साल पहले एक-एक गांव को संस्कृत गांव के रूप में चयनित किया गया था लेकिन शासन के आदेश के बाद हर जिले के डीएम की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की गई है। ग्राम स्तर पर सर्वेक्षण कर ये समिति संस्कृत गांवों के चयन से लेकर संस्कृत प्रशिक्षक से लेकर संस्कृत प्राथमिक विद्यालय संचालन के लिए भी जरूरी व्यवस्था करेगी। - डॉ. वाजश्रवा आर्य, सचिव, उत्तराखंड संस्कृत शिक्षा परिषद, हरिद्वार।