फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अंतिम सांस तक उठाई इलाके के विकास को आवाज

Sat, 09 Jan 2016 10:37 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत
विज्ञापन
विज्ञापन
सूखीढांग क्षेत्र के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामचंद्र चौड़ाकोटी में देश को आजाद करने की अद्भुत ललक थी। 1 जनवरी 1914 को किसान परिवार में जन्में इस शख्स के जुनून ने दो बार जेल में भी अनशन किया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 50 रुपये के जुर्माने के अलावा अल्मोड़ा से लेकर बरेली तक जेल की यात्राएं भी की।
विज्ञापन


प्राइमरी से आगे की शिक्षा के लिए खेतीखान गए रामंचद्र काली कुमाऊं के शेर पंडित हर्षदेव ओली के सानिध्य में आए। उनकी प्रेरणा ने चौड़ाकोटी में जोश भरा और वे आजादी की जंग में कूदे। 28 साल की उम्र में उन्होंने देवीधुरा में जोरदार प्रदर्शन किया। अंग्रेजी हुकूमत ने दो हफ्ते बंद रखने के बाद उन्हें रिहा किया। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दस्तावेज बताते हैं कि भारत 1942 में अंग्रेजों के खिलाफ योजनाबद्ध जंग के लिए उन्होंने कांग्रेस मंडल चौड़ाकोट संगठन बना श्यामलाताल में संघर्ष छेड़ा। उन्होंने डांडा, बुड़म आदि दूरदराज के इलाकों में जन-जागृति की।

अंग्रेजों को पहाड़ की ओर बढ़ने से रोकने के लिए चल्थी पर मार्ग अवरुद्ध करने की योजना दियूरी में अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किए जाने से विफल रही। गोरलचौड़ मैदान की अस्थायी जेल में रखने के बाद छह अन्य सेनानियों के साथ उन्हें भी सजा सुनाई गई। जुर्माने के साथ ही चौड़ाकोटी को अल्मोड़ा जेल भेजा गया। जेल में भी आंदोलन जारी रखने के चलते अंग्रेजों ने उन्हें बरेली जेल पहुंचा दिया।
विज्ञापन


चौड़ाकोटी ने आजादी के बाद भी इलाके के विकास के लिए संघर्ष किया। सेनानी के बेटे और सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के जिलाध्यक्ष महेश चौड़ाकोटी बताते हैं कि 1948 में साधन सहकारी समिति के सभापति, वमनजौल के सरपंच, ज्येष्ठ उप प्रमुख की जिम्मेदारी संभालने के अलावा 10 जनवरी 2001 में आखिरी सांस लेने से पूर्व तक वे लगातार इलाके की तरक्की के लिए लगे रहे। रामचंद्र और अन्य छह सेनानियों के सम्मान में धुरा में दो साल पहले सेनानी स्मारक बनाया गया।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें