सड़क दुर्घटनाओं में मौतों का सिलसिला लगातार बढ़ रहा है। आखिर इन बिन बुलाई मौतों का जिम्मेदार कौन है? जबकि हर हादसे के बाद मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए जाते हैं, रिपोर्ट भी आती है फिर दुर्घटनाओं का ये सिलसिला कभी थमता नहीं है। आखिर इन मौतों को रोकने का दायित्व किसका है।
टनकपुर-पिथौरागढ़ एनएच पर बुधवार को हुई दुर्घटना में 10 लोगों की जिंदगी पर विराम लग गया। इस दुर्घटना में वाहन में सवार सभी लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। 55 साल की महिला से लेकर 10 साल के मासूम तक इस अकाल मौत की चपेट में आए। स्वांला के पास जहां यह दुर्घटना हुई है वहां पर न तो सड़क संकरी है, और न ही ज्यादा तीखा मोड़ है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है आखिर इन मौतों के लिए जिम्मेदार कौन है? परिवहन विभाग, पुलिस, प्रशासन या फिर अमूमन बेपरवाह रहने वाले टैक्सी चालक? इनमें से जो भी कसूरवार हो, पर इस एक हादसे ने आठ परिवारों की हंसती-खेलती जिंदगी पर ग्रहण लगा दिया।
दुर्घटना की भयावहता इतनी तीव्र थी कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की ओर से मजिस्ट्रेट जांच के आदेश आते देर नहीं लगी। क्या मजिस्ट्रेटी जांच सही तरीके पूरी भी हो पाएगी और इस जांच का जमीन पर असर क्या होगा? यह सवाल जनमानस के बीच तेजी से उभर रहे हैं। जांच की रस्म तो पूर्व में हुए हादसों के बाद भी की गई, लेकिन हादसे के ऊंचा होते ग्राफ और मरने वालों की बढ़ती संख्या बताती है कि कि अब तक मजिस्ट्रेटी जांच रिपोर्टों का जमीनी क्रियान्वयन हवा-हवाई रहा है।
हत्या से पांच गुना से अधिक लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं से
चंपावत।तो क्या सड़क हादसे सबसे बड़े हत्यारे हैं। आंकड़े तो इस बात की पूरी तरह पुष्टि करते हैं। ये चुनौती कितनी भयावह है, इसका अंदाज बस इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि सड़क हादसों से होने वाली मौतों का आंकड़ा हत्याओं से भी ऊपर चढ़ गया है। बीते सात वर्षों में सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वालों की संख्या हत्या के शिकार हुए लोगों की अपेक्षा पांच गुना से भी अधिक है। तेज गति और बेपरवाह तरीके से चलने वाले वाहन लोगों की जिंदगी के लिए बड़ा खतरा बन रहे हैं।
चंपावत जिले में सड़कों का बहुत जाल नहीं है और नहीं वाहनों की संख्या अभी बड़े शहरों की तरह बेशुमार है। जिले में एनएच सहित सड़क की कुल लंबाई करीब 1200 किलोमीटर है, जबकि दोपहिये को मिलाकर करीब 23 हजार वाहन जिले में पंजीकृत हैं। यहां सड़क पर वाहनों का अधिक दबाव भी नहीं है। इसके अलावा पहाड़ों पर 2002 से रात में वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध है। इन सबके बावजूद यहां सड़क दुर्घटनाओं में अंकुश नहीं लग पा रहा है। इन पर अंकुश लगाने के दावों के बावजूद जमीन पर खास कुछ किया नहीं जा रहा है।
इधर एआरटीओ रश्मि भट्ट का कहना है कि सड़क हादसों को रोकने के लिए परिवहन विभाग लगातार कदम उठा रहा है। इनफोर्समेंट के अलावा वाहनों की फिटनेस, ओवरलोड, तेज गति, शराब पीकर वाहन चलाने वालों पर लगातार कार्रवाई की जा रही है। इसके अलावा सड़क सुरक्षा गोष्ठी, रैली, पर्चे वितरण, स्कूलों में डॉक्यूमेंट्री के जरिए जागरूकता की मुहिम चलाई जा रही है। एसपी धीरेंद्र गुंज्याल का कहना है कि सड़क हादसों को रोकने के लिए पुलिस विभाग प्रशासन और परिवहन विभाग के साथ मिलकर अभियान चला रही है। इस हादसे से सीख लेते हुए सुरक्षा के और कड़े कदम उठाए जाएंगे।
वर्ष सड़क दुर्घटनाओं में मौत हत्याएं
2011 15 02
2012 18 02
2013 16 06
2014 08 02
2015 08 05
2016 14 01
2017 17 01
2018 (7 फरवरी तक) 12 01
कुल 108 20
स्वांला: 11 माह, चार हादसे, 15 की मौत
चंपावत। स्वांला क्षेत्र जिले का सबसे बड़ा ब्लैक स्पॉट साबित हो रहा है। यहां महज 11 महीने में चार सड़क हादसे हो चुके हैं। इसमें 15 यात्रियों की जान जा चुकी है। पिछले साल 28 मार्च को यहां पर ट्रक और कार की भिड़ंत में पति-पत्नी की मौत हो गई थी, जबकि 16 अगस्त को टिप्पर हादसे में एक व्यक्ति की मौत हुई। इस साल 16 जनवरी को एक बाइक के दुर्घटनाग्रस्त होकर 400 मीटर नीचे खाई में गिरने से दो बाइक सवारों की मौत हो गई थी। बुधवार को यहां पर जीप हादसे में 10 लोगों की मौत हुई। वैसे राज्य बनने के तुरंत बाद 2001 में मंदिर के पास ही जीप दुर्घटना हुई थी, जिसमें सात लोगों की मौत हुई थी।
स्वांला हादसे के बाद बना पीएसी जवानों का स्मारक
चंपावत। स्वांला मंदिर के पास बुधवार को हुए हादसे ने 25 फरवरी 1952 को हुई दुर्घटना को ताजा कर दिया। 1952 में हुई दुर्घटना लोकसभा चुनाव को निपटा कर लौट रहे पीएसी बरेली की आठवीं बटालियन के वाहन के गहरी खाई में गिरने से आठ जवानों की मौत हो गई थी। बाद में इस जगह पर मंदिर और स्मारक बनाया गया।
आजादी के बाद 25 अक्तूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक हुए पहले लोकसभा चुनाव में पहाड़ी क्षेत्र में मतदान सबसे आखिर में था। चुनाव निपटने के बाद 25 फरवरी 1952 को सुरक्षा बल वापस जा रहे थे। तभी पीएसी की बरेली स्थित 8वीं बटालियन के वाहन का हादसा हो गया। चंपावत से 22 किमी दूर स्वांला के पास यह वाहन 200 मीटर खाई में गिर गया। स्वांला मंदिर के पास पीएसी के भूपाल सिंह, जगत सिंह, मान सिंह, नैन सिंह, वीर सिंह, रुद्र सिंह, पुरुषोत्तम सिंह और बतवा सिंह की मौत हो गई थी। बाद में इस स्थान पर उनकी याद में एक स्मारक भी बनाया गया। इसमें सभी आठ मृत जवानों का नाम अंकित किया गया है। यहां के बुजुर्ग बताते हैं कि संचार सुविधा नहीं होने से हादसे की जानकारी भी कई घंटों बाद मिली। तब न तो आसपास में कहीं पुलिस थाना था और नहीं कोई अस्पताल।
हादसे के बाद बना दुर्गा मंदिर
चंपावत से 22 किमी दूर स्वांला के पास दुर्घटनाग्रस्त स्थान पर सड़क किनारे एक मंदिर बनाया गया। पुजारी पंडित भुवन मुरारी बताते हैं कि तब सड़क भी बेहद खराब थी और इस मार्ग पर आवाजाही भी खासी कम होती थी। हादसे के बाद वर्षों तक लोगों में दहशत थी। बाद में इसी जगह पर मां दुर्गा मंदिर बनाया गया।