मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का दूसरा आम बजट बेहद मुश्किल हालात में पेश विकासपरक बजट है। हालांकि इस बजट को लेकर लोगों के मन में काफी उलझन है, जिसे अमर उजाला ने ‘बजट को समझिए’ विषय पर संवाद के जरिए सुलझाने का प्रयास किया है।
संवाद में मौजूद टैक्स के जानकारों ने आयकर के नए और पुराने स्लैब को लेकर लोगों की दुविधा को दूर किया और उन्हें समझाया कि वेतनभोगी तो हर वित्तीय वर्ष में नए से पुराने या पुराने से नए स्लैब का विकल्प चुन सकते हैं, लेकिन कारोबारियों को सरकार ने यह सुविधा नहीं दी है। हालांकि बजट में गांव और पहाड़ गायब होने से लोग बजट से निराश भी नजर आए।
बोले विशेषज्ञ:
बजट में बैंक के डूबने पर आम लोगों की रकम को बचाने के लिए पांच लाख रुपये तक की सुरक्षा गारंटी दी गई है। इससे लोगों का बैंक पर भरोसा बढ़ेगा। मगर एनपीए और कई बैंकों में घोटाले के अरोपों के बीच आम आदमी असमंजस में भी है। इसका असर बैंकों की पूंजी पर पड़ सकता है। आशंकाओं के बीच लोग बैंकों में कम धन रखने के विकल्प को आजमा सकते हैं। इसका प्रभाव लोगों की बचत और बैंकों की जमा पूंजी पर पड़ेगा। कम जमा पूंजी से बैंक उद्योगों और विभिन्न योजनाओं में कर्ज देने की स्थिति में कम रहेंगे।
बैंकर महेंद्र सिंह तड़ागी, वित्तीय परामर्शदाता, लीड बैंक प्रबंधक।
बोले विशेषज्ञ:
आयकर स्लैब बढ़ाए गए हैं। इसका लाभ केवल उन लोगों को मिलेगा जिनके पास निवेश नहीं है और 15 लाख रुपये तक की सालाना आमदनी है। उनकी आयकर की दर कम हो जाएगी। अलबत्ता नई दर का सबसे ज्यादा लाभ पांच लाख रुपये तक की आय वर्ग के लोगों को होगा। और ये तादात उत्तराखंड के पर्वतीय हिस्से में 85 प्रतिशत से ज्यादा है। नौकरीपेशा वर्ग के लिए आयकर का पुराना मॉडल अधिक बेहतर होगा। कुल मिलाकर नए प्रावधानों से आयकर दाताओं पर बोझ बढ़ने की आशंका अधिक रहेगी।
एडवोकेट दीपक जोशी, आयकर विशेषज्ञ।
भारतीय जीवन बीमा निगम में विनिवेश का एलान चिंताजनक है। बजट के बाद से अनेकों बीमाधारक इसे लेकर आशंकित भी है। और वे इसे लेकर पूछताछ कर रहे हैं। वस्तुस्थिति बहुत साफ नहीं होने से वे और उन जैसे अन्य लोग असमंजस में है।
राजेंद्र गहतोड़ी, बीमा सलाहकार।
व्यापार और कारोबार से सबसे ज्यादा राजस्व तो मिलता है, लेकिन बजट में इस वर्ग को अनसुना किया गया है। मंदी से निपटने की छिटपुट कोशिश तो हुई है, लेकिन एकाएक जरूरी खाद्य पदार्थो में बढने वाली कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए अलग से बजट का प्रावधान नहीं किया गया है। कमलेश राय, व्यापारी।
रक्षा बजट पर छह प्रतिशत बढ़ोत्तरी के साथ 3.37 लाख करोड़ करना अच्छा कदम है, मगर ये पर्याप्त नहीं है। आठ देशों की सीमा से लगे भारत में कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों में अक्सर हलचल रहती है। छद्म युद्ध से जूझ रहे भारत को आधुनिक तकनीक, परिष्कृ हथियार, सैनिकों की सुविधाओं में वृद्धि करनी होगी। वीरेंद्र सिंह रैंसवाल, पुलवामा शहीद राहुल रैंसवाल के पिता व पूर्व नायक, आसाम रायफल्स।
देश को खेल में सिरमौर बनाने के लिए किशोरावस्था से ही प्रेरित करना होगा। इसके लिए जमीनी स्तर पर फिट इंडिया, खेलो इंडिया सहित कई कार्यक्रम चल भी रहे हैं। मगर खेल के मैदान, प्रशिक्षक सहित जरूरी बुनियादी सुविधाएं चाहिए। मगर केंद्रीय बजट में सिर्फ 50 करोड़ रुपये की बढ़ोत्तरी से बहुत उम्मीद नहीं जगती। चंदन सिंह बिष्ट, उप जिला क्रीड़ाधिकारी।
बजट में पहली बार पोषण से जुड़ी योजनाओं पर 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी उल्लेखनीय है। चंपावत जिले सहित तमाम कुपोषित क्षेत्रों के नौनिहालों को इसका लाभ मिलेगा। महिला सुरक्षा और बालिका शिक्षा को आगे बढ़ाने का भी प्रयास किया गया है। विनीता फर्त्याल, ब्लाक प्रमुख, बाराकोट।
ऑटोमोबाइल क्षेत्र में सबसे ज्यादा मंदी रही। इसकी मार ग्रामीण अर्थव्यवस्था आधारित जिलों पर सबसे ज्यादा पड़ी है। वाहनों की बिक्री में कमी से लेकर उपकरणों की खरीद में गिरावट से आय पर वार हुआ है। बजट में इस सेक्टर को बढ़ाने के कारगर उपाय कहीं नहीं है।
सुधीर साह, ऑटोमोबाल कारोबारी।
बजट ने शिक्षा क्षेत्र की उम्मीद को मायूस किया है। शिक्षा मद पर इस बार 99300 करोड़ रुपये आवंटित किया गया है, जो मौजूदा वित्त वर्ष से 447 करोड़ रुपये ज्यादा है। ये रकम नाकाफी है। शिक्षा की गुणवत्ता, आधुनिक शिक्षा प्रणाली, विश्व स्तरीय अनुसंधान के लिए शिक्षा मद में जीडीपी का कम से 6 प्रतिशत खर्च किया जाना चाहिए।
डॉ. बीसी जोशी, प्रधानाचार्य (राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता)।
देशभर की विभिन्न अदालतों में रिक्त न्यायिक अधिकारियों के पदों को भरने से ही जल्द से जल्द मामलों का निस्तारण हो सकता है। तभी तेजी से इंसाफ भी मुमकिन है। जिला शासकीय अधिवक्ता भास्कर मुरारी।
बजट में ग्रामीण इलाकों के लिए कुछ नहीं है। पलायन से गांव खाली हो रहे हैं लेकिन बजट में इसके समाधान के लिए कुछ नहीं किया गया।
एडवोकेट विद्याधर जोशी।
प्रधानमंत्री भारत को विश्व गुरु बनाने की बात कहते हैं। इस दिशा में वे पहल भी कर रहे हैं। लेकिन बजट में संस्कृति, साहित्य की अनदेखी से लेकर गो, गाय व गंगा पर कम तवज्जो दी गई है। ऐसे में हम कैसे विश्व गुरु बनेंगे, सवाल पैदा करता है।
प्रकाश जोशी शूल, साहित्यकार।
सेहत के बजट में 3.76 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी अच्छा कदम है। हर जिले में मेडिकल कॉलेज खोलने का प्रस्ताव बजट की सबसे बड़ी खूबी है। इसका सबसे ज्यादा लाभ पहाड़ी जिलों के दूरस्थ गांवों की स्वास्थ्य सेवाओं को होगा।
डॉ. आरपी खंडूरी, मुख्य चिकित्साधिकारी।
किसानों की आय बढ़ाने की पहल तो ठीक है, लेकिन इसके लिए चंपावत सहित दूरदराज के इलाकों में सिंचाई से लेकर भंडारण तक की व्यवस्था नहीं है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में चकबंदी और जंगली जानवरों से बचाव के लिए ठोस कार्ययोजना चाहिए।
बहादुर सिंह फर्त्याल, कारोबारी।
संवेदनशील सीमा पर सुरक्षा करने वाले अर्द्ध सुरक्षा बल के जवानों के साथ बजट में दोयम दर्जे का बर्ताव किया गया है। उन्हें सीमा पर जान गंवाने के बावजूद न तो शहीद तक का दर्जा मिलता है और नहीं फौज के समान सुविधाएं। बजट में भी इसे लेकर कोई जिक्र नहीं किया गया है।
नारायण राम टम्टा, पूर्व अर्द्ध सुरक्षा बल अधिकारी