चंपावत के साथ जिला बने बागेश्वर में ब्लड बैंक, ट्रामा सेंटर सहित बदतर स्वास्थ्य सुविधा का मसला अब हाईकोर्ट में पहुंच चुका है। बागेश्वर जैसे ही बदतर हालत इस जिले की भी है। 18 साल पुराने चंपावत जिले में जिला अस्पताल (डीएच) में ब्लड बैंक भवन होने के बावजूद ब्लड बैंक भी नहीं है। ब्लड बैंक नहीं होने से यहां के लोगों को नाजुक मौके पर खून पाने के लिए पसीना बहाना पड़ता है। आने-जाने में ही कम से कम 150 किमी की दौड़ लगानी पड़ रही है।
चंपावत डीएच में 22.90 लाख रुपये लागत का ब्लड बैंक भवन 2012 में बन गया था, लेकिन फिर भी यहां खून की उपलब्धता नहीं हो पाती है। इस भवन को अपने नाम को सार्थक करने का इंतजार है। इस वजह से हादसे और अन्य मौकों पर खून नहीं मिल पा रहा है। जिले के इस इकलौते ब्लड बैंक के अस्तित्व में नहीं आने से लोगों को भारी दुश्वारी हो रही है। जरूरत के वक्त खून पाने के लिए पिथौरागढ़ (आवाजाही 150 किमी) या रुद्रपुर (आवाजाही 280 किमी) की दौड़ लगाना यहां के लोगों की नियति है। ये फासला कई बार जिंदगी पर भारी पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक जिले में वक्त पर खून नहीं मिलने से से औसतन सालभर में 13 लोगों की मौत होती है।
जिला अस्पताल के सर्जन डा.आरपी खंडूरी का कहना है कि ब्लड बैंक गर्भवती महिलाओं, रक्त अल्पता, हादसों में ही नहीं आपरेशन के वक्त रक्त की कमी की भरपाई के लिए जरूरी है। बड़े आपरेशनों के लिए निश्चेतक के साथ ही ब्लड बैंक भी जरूरी है। खून की कमी इंसान की कार्यक्षमता पर असर डालने के साथ रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता प्रभावित होती है।
सृजित नहीं हुए ब्लड बैंक के पद
ब्लड बैंक के लिए उपकरण, रक्तदाता (डोनर) और अवस्थापना ढांचा जरूरी है। पदों तके सृजन भी नहीं हुए है। चिकित्साधीक्षक डा.एसबी ओली का कहना है कि ब्लड बैंक अधिकारी (पैथौलोजिस्ट) के अलावा एलटी, स्टाफ नर्स, लैब सहायक, डाटा एंट्री ऑपरेटर और स्वच्छक का पद जरूरी है। फिलहाल इनमें से पैथोलोजिस्ट, एलटी और स्टाफ नर्स की जिला अस्पताल में तैनाती है।
ब्लड बैंक को लेकर जिला स्तर से लगातार पत्राचार किया जा रहा है। भारत सरकार की टीम के अनुमोदन के बाद ब्लड बैंक अस्तित्व में आ सकेगा। राज्य औषधि नियंत्रक का निरीक्षण हो चुका है। पिछले साल नवंबर में यहां के मुआयने के बाद राज्य मानवाधिकार आयोग ने भी इस संबंध में आवाज उठाई है।
डा.विनोद टोलिया मुख्य चिकित्साधिकारी, चंपावत।