चंपावत। चौबे होली कुमाऊं के चंद राजवंश की आठ सदी तक राजधानी रही चंपावत की धरोहर रही है, लेकिन अब यह खूबसूरत होली गुम हो गई है। राज्य बनने के बाद इसे संरक्षित नहीं किया जा सका। कई बार आई अड़चनों के बाद बीच-बीच में चौबे होली का गायन जरूर हुआ, लेकिन 2014 से इस पर पूर्ण विराम लग गया। चौबे होली को चाराल क्षेत्र के लोग राजवंश के सम्मान में गाते थे।
चौबे होली चंद राजवंश की सांस्कृतिक विरासत की चमकदार परंपरा थी, लेकिन आठ साल से यह शानदार परंपरा अतीत का हिस्सा बन गई है। राजवंश के सम्मान में होने वाली इस होली का गायन तड़ागी, बोरा, कार्की एवं चौधरी राज दरबार में करते थे। चंद राजवंश की राजधानी अल्मोड़ा जाने से पहले तक यानी 1543 तक चौबे होली यहां के विभिन्न मंदिरों के अलावा तहसील परिसर में होती थी। 1980 के दशक तक चौबे होली पूरे उत्कर्ष पर थी। उत्तराखंड बनने के बाद चौबे होली को कुमाऊं सांस्कृतिक संघ विरासत के प्रयास से दोबारा शुरू तो किया गया, लेकिन ये भी लंबे समय तक चल नहीं सकी। अब इतिहास में समा गई है।
होली के मर्मज्ञ ललित गहतोड़ी शराब के साथ ही संस्कृति विभाग की उदासीनता और सांस्कृतिक दलों को प्रोत्साहन न मिलने को इस परंपरा के खात्मे का कारण मानते हैं। वहीं साहित्यकार प्रकाश जोशी शूल शराब के बढ़ते चलन, सांस्कृतिक परंपराओं की अनदेखी और मोबाइल क्रांति को चौबे होली के ठहराव का कारण बताते हैं।
ये है चौबे होली
चंपावत। चौबे होली का अर्थ ऐतिहासिक चंपावत नगरी के चारों तरफ यानी चाराल क्षेत्र के चैकुनी बोरा, खर्ककार्की, ढकना, चौकी, पल्सों, मादली, कुलेठी आदि गांवों से आने वाले होल्यारों की टीम से है। राजा बलि के द्वार पर हर टीम मंचीय होली का गायन करती थी। (ब्यूरो)