नेपाल में आर्थिक तंगी के चलते स्कूली बच्चे अवकाश के दिनों भारत आकर मेहनत मजदूरी कर अपने स्कूल का सालभर का खर्च स्वयं जुटाते हैं। नेपाल में सावन, भादौ, असौज में तीन माह का अवकाश होता है। इस अवधि में यहां नेपाल के कई गांवों के बच्चे लोहाघाट आदि स्थानों पर मजदूरी के लिए आते हैं।
दयलेख गांव के आठवीं कक्षा के सरजन साही, उन्हीं के साथ सुनील साही, दीपेंद्र साही और 10वीं कक्षा में पढ़ रहे हिमा साही का कहना है कि उनके माता-पिता काफी गरीब हैं, जो उनकी पढ़ाई का खर्च नहीं उठा पाते हैं। इसलिए वे वर्ष में तीन माह के लिए मेहनत-मजदूरी करने यहां आते हैं।
नेपाल से आधे बच्चे छुट्टियों में मेहनत-मजदूरी के लिए भारत के विभिन्न स्थानों में आते हैं। उनके गांव से लगभग पांच किमी दूर विद्यालय है, उन्हें रोज 10 किमी आना-जाना पढ़ता है, जबकि 10वीं कक्षा के बच्चों को तो और अधिक दूरी तय करनी पड़ती है। इनका कहना है कि तीन माह के दौरान वे अपना खर्च काटकर छह से आठ हजार रुपये मेहनत-मजदूरी से कमा कर घर ले जाते हैं। इससे उनका साल भर का स्कूल का खर्च चलता है। इन बच्चों को नेपाल में नई संवैधानिक व्यवस्था लागू होने की कोई जानकारी नहीं है।