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पूर्णागिरि मेले के ठेके को लेकर दो हफ्ते में देने में होगा हलफनामा

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मां पूर्णागिरि धाम का मंदिर। - फोटो : TANAKPUR
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चंपावत। पूर्णागिरि मेला 30 मार्च से शुरू होगा। जिला प्रशासन ने इसकी तैयारी पूरी कर ली है, वहीं जिला पंचायत अध्यक्ष ज्योति राय की ओर से उत्तराखंड उच्च न्यायालय नैनीताल में याचिका दायर की गई है।
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याचिका में मेले के ठेके का अधिकार जिला पंचायत को देने और इससे होने वाली आय जिला पंचायत निधि में स्थानांतरित करने के लिए मेला प्रशासन को आदेश देने की मांग की गई है। याचिका पर न्यायालय ने प्रशासन को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह में हलफनामा दायर करने के आदेश दिए हैं।
जिला पंचायत अध्यक्ष की ओर से 24 मार्च को उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई। इसमें उन्होंने मां पूर्णागिरि धाम के मेला क्षेत्र में बाल मुंडन आदि व्यवस्थाओं संबंधी ठेके का अधिकार जिला पंचायत को देने और इससे होने वाली आय को जिला पंचायत निधि में जमा कराने की मांग की है। इसके लिए उन्होंने जिला पंचायत की नियमावली 2016 का भी हवाला दिया है।
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पूर्णागिरि मेले के मजिस्ट्रेट टनकपुर के एसडीएम, मेलाधिकारी जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी के अलावा पंचायती राज विभाग के सचिव, चंपावत के डीएम को प्रतिवादी बनाया गया है। उच्च न्यायालय के वादधारक (ब्रीफ होल्डर) बीपीएस मेर ने बताया कि अदालत ने इस मामले में दो सप्ताह के भीतर हलफनामा देकर जवाब दायर करने का वक्त दिया है।
अदालत जाने से पहले जिला पंचायत अध्यक्ष ज्योति राय ने नौ फरवरी को मेला मजिस्ट्रेट को पत्र भेज मेले से होने वाली आय 2011 से पहले की तरह जिला पंचायत कोष में जमा न कराने पर न्यायालय जाने की चेतावनी भी दी थी।
उच्च न्यायालय की ओर से वादधारक बीपीएस मेर का नोटिस मिला है। नोटिस में दिए गए दो हफ्ते के समय अवधि जवाब दायर कर दिया जाएगा।
- हिमांशु कफल्टिया, मेला मजिस्ट्रेट, टनकपुर।
वर्ष 2010 तक जिला पंचायत को मिलती थी ठेकों से होने वाली आय
चंपावत। मां पूर्णागिरि धाम के मेले को वर्ष 1985 से जिला पंचायत संचालित कराती थी। वर्ष 2010 तक मेले से मिली राशि जिला पंचायत की आय का प्रमुख स्रोत होता था। बूम से लेकर मां पूर्णागिरि के मुख्य मंदिर तक का 12 किमी का हिस्सा मेला क्षेत्र में आता है, लेकिन इस मेला क्षेत्र का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आरक्षित वन क्षेत्र है।
वर्ष 2010 में अदालत ने आरक्षित वन क्षेत्र में गैर वानिकी गतिविधियों पर रोक लगा दी थी। इसके तहत जिला पंचायत मेले के वन क्षेत्र में न दुकान लगा सकता था और नहीं गैर वानिकी गतिविधियां कर सकता था। वर्ष 2011 से मेले की आर्थिक गतिविधियां जिला पंचायत के स्थान पर नई गठित मेला समिति के पास चली गई। समिति में मेलाधिकारी (एसडीएम), जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी और मंदिर समिति के अध्यक्ष शामिल हैं।
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