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देर आये लेकिन दुरुस्त नहीं:एसआईटी जांच में कोई दागदार नहीं

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चंपावत। पाटी ब्लाक के भिंगराड़ा क्षेत्र में 2011-12 में मनरेगा के तहत हुए 1.17 करोड़ रुपये के कार्यों में गड़बड़ियों के आरोपों की जांच एसआईटी ने पूरी कर ली है, लेकिन दो साल तक चली लंबी जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी। साक्ष्य नहीं जुटा पाने से इस मामले में मनरेगा से जुड़े विभाग बेदाग निकल गए। एसपी लोकेश्वर सिंह का कहना है कि एसआईटी की जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश की जाएगी।
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उच्च न्यायालय के अधिवक्ता संजय भट्ट की जनहित याचिका पर उच्च न्यायालय ने 14 अगस्त 2018 को एफआईआर करने के आदेश दिए थे। पाटी के बीडीओ की तहरीर पर 15 सितंबर को पाटी थाने में अज्ञात लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 409, 420, 467, 468 और 471 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था। नौ साल पहले मनरेगा के तहत 36 वन पंचायतों में हुए मृदा और जल संरक्षण के कामों में फर्जी मस्टररोल, निर्माण सामग्री की आपूर्ति गैर पंजीकृत कंपनियों से करने, वैट अदा न करने आदि के आरोप लगे थे। जांच अधिकारी मनीष खत्री का कहना है कि कार्यों से संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल, मौका मुआयना, तकनीकी टीम की ओर से भौतिक सत्यापन के साथ ही 100 से अधिक मजदूर और अन्य लोगों से पूछताछ की गई। इन सबके अलावा लॉकडाउन से जांच में लंबा वक्त लगा। बताया गया कि मौके पर निर्माण कार्य होने की भी पुष्टि हुई है।
ये थे मुख्य आरोप:
-सात गैर पंजीकृत कंपनियों से 37.18 लाख रुपये का सीमेंट खरीदना।
-गांव छोड़ अन्यत्र जा चुके और निजी स्कूलों में पढ़ाने वालों को मनरेगा मजदूर बनाना।
-कई वन पंचायतों में बगैर पंचायत के अनुमोदन के काम कराना।
कोट...
एसआईटी की पड़ताल में आरोपों की तस्दीक नहीं हो सकी। मनरेगा में भिंगराड़ा क्षेत्र में काम करने वाले हर व्यक्ति ने अपने बयान में मजदूरी करने की पुष्टि की है। सामग्री आपूर्ति करने वाली कंपनी ने भी बाद में पंजीकरण कराने के साथ वैट की राशि जमा करा दी।-लोकेश्वर सिंह, एसपी, चंपावत।
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मनरेगा धांधली मामले में जांच टीम ने अक्तूबर 2018 में मेरे बयान लिए थे। एसआईटी की जांच के क्या निष्कर्ष है, ये अभी उनकी जानकारी में नहीं है। लेकिन इस मामले में पुख्ता दस्तावेजी सबूत हैं। जांच से संतुष्ट नहीं होने अब दूसरे विधिक विकल्पों का उपयोग किया जाएगा। -संजय भट्ट, अधिवक्ता, हाईकोर्ट
...तो भुगता देरी का खामियाजा!
भिंगराड़ा क्षेत्र में मनरेगा मामले में जांच प्रक्रिया में लंबा वक्त लगने से सच सामने नहीं आ सका। अधिवक्ता संजय भट्ट देरी के अलावा जांच के तौर तरीकों पर भी सवाल खड़ा करते हैं। 2012-13 में तत्कालीन सीडीओ की जांच में सरकारी विभागों को क्लीन चिट मिली थी। बाद में एडवोकेट भट्ट ने धांधली के आरोपों की तह तक जाने के लिए आरटीआई से जानकारी ली थी। वे मामले को लोकायुक्त में भी ले गए, लेकिन जांच पूरी होने से पहले लोकायुक्त का कार्यकाल पूरा हो गया। तब से लोकायुक्त का पद खाली है। मई 2015 में उन्होंने जनहित याचिका दाखिल की। तत्कालीन मंडलायुक्त एएस नयाल ने अक्तूबर 2015 में शासन को भेजी रिपोर्ट में अनियमितताओं की पुष्टि करते हुए एफआईआर की संस्तुति की थी। लेकिन तब एफआईआर नहीं हो सकी थी। बाद में कोर्ट के आदेश से सितंबर 2018 में एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच शुरू हुई।
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