फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मजदूर राहत केंद्रों में, कैसे कटेगी खेत में खड़ी फसल

विज्ञापन
चंपावत राहत केंद्र में मौजूद मजदूर। - फोटो : AMAR UJALA
विज्ञापन
अमर उजाला ब्यूरो  चंपावत। उप्र के बहेड़ी के 17 मजदूर 30 मार्च से, तो बहराइच व कई अन्य जगहों के 20 मजदूर 2 अप्रैल से चंपावत के राहत केंद्र में फंसे हैं। वे यहां राहत केंद्र में हैं जरूर, लेकिन उनकी आंखों के सामने गांव के खेत नजर आ रहे हैं। इन मजदूरों की चिंता खेतों में खड़ी गेहूं की फसल के न कट पाने को लेकर है। ऐसे ही हाल बनबसा व जिले के कई अन्य जगहों के भी है। बृहस्पतिवार को इन मजदूरों ने अमर उजाला के साथ अपना दर्द बयां किया। कहा कि न मजदूरी का पैसा बचा और नहीं फसल कटान की कोई उम्मीद। बहेड़ी के जयपाल, चंद्रपाल, महेश गंगावार, पप्पू लाल, प्रेम पाल सहित ढेरों मजदूर गांव में खड़ी गेहूं की फसल के न कट पाने से फिक्रमंद है। कुछ के अपने खेत हैं, तो कई बंटाई करते हैं। बताते हैं कि वैसे तो उनके परिवार के पास फसल को मजदूरों से कटाने के लिए रुपये नहीं है, कहीं से कर्ज लिया भी तो इस वक्त लॉकडाउन में मजदूर कहां मिलेंगे? कहते हैं कि वे हर साल पिथौरागढ़ से गेहूं की फसल को काटने के लिए घर जाते थे। गेहूं काटने से लेकर फसल को मंडी तक पहुंचाने के बाद लौटते थे। मगर इस बार बीच मंझधार में फंस गए। पिथौरागढ़ जिले के धारचूला से पैदल चल चार दिन में चंपावत पहुंचे, तो लॉकडाउन के उल्लंघन में दबोच लिए गए। और प्रशासन ने उन्हें रैनबसेरा के राहत केंद्र में भेज दिया। मजदूर बताते हैं कि राहत केंद्र की व्यवस्था से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। बीच-बीच में डॉक्टर स्वास्थ्य परीक्षण भी करते हैं, दो वक्त के भोजन व चाय की व्यवस्था भी की गई है। मगर उनकी चिंता खेत की मेहनत बेकार जाने को लेकर है। अगर एक हफ्ते में फसल न कटी, तो पूरे परिवार की भूखों मरने की नौबत आ सकती है। मजदूर बताते हैं कि उन्हें राहत केंद्र में 14 दिन से अधिक का वक्त भी हो चुका है, कोई बीमारी भी नहीं है। ऐसे में उन्हें बहेड़ी भेजने की व्यवस्था की जानी चाहिए। इधर डीएम सुरेंद्र नारायण पांडेय का कहना है कि कोरोना वायरस से बचाव के लिए फिलहाल उन्हें भेजना संभव नहीं है। मजदूरों के खाने व रहने की उत्तम व्यवस्था की गई है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें