चंपावत में कुमूं के नाम से विख्यात चाराल क्षेत्र का विहंगम दृश्य।
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वर्तमान में भले ही नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत और ऊधमसिंह नगर के छह जिलों को कुमाऊं कहा जाता हो, लेकिन कभी कुमाऊं शब्द सिर्फ चंपावत चाराल क्षेत्र के लिए ही प्रयुक्त होता था। कुमाऊं शब्द का जन्म चंपावत में ही हुआ है। इस बात को अधिकांश इतिहासकारों के साथ ही स्कंद पुराण के केदार और मानस खंड में भी माना गया है। कुमाऊं संस्कृत के कूर्म शब्द का अपभ्रंश है।
ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु का कूर्म अवतार कूर्म पर्वत के शिखर पर हुआ था। जहां वर्तमान में बहुत ही सुंदर भव्य मंदिर बना हुआ है। माना जाता है कि भगवान विष्णु के पदचिन्ह आज भी यहां मौजूद हैं, जिनकी पूजा की जाती है।
इतिहासकार बद्री दत्त पांडेय ने अपनी किताब कुमाऊं का इतिहास में विष्णु का कूर्मावतार स्थल चंपावत की क्रांतेश्वर पर्वत की चोटी पर ही बताया है। राजकीय महाविद्यालय के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. प्रशांत जोशी के अनुसार चंपावत क्षेत्र का रामायण और महाभारत काल से भी अटूट संबंध रहा है।
यह भी मान्यता है कि राम-रावण संग्राम के दौरान कुंभकर्ण का सिर कट कर चंपावत क्षेत्र में जा गिरा था जिसके चलते इस क्षेत्र को कुंभू और बाद में कूमूं कहा गया। वर्ष 1560 तक चंद शासकों की राजधानी चंपावत से अल्मोड़ा स्थानांतरित होने से पूर्व तक चंपावत और आसपास के इलाकों को ही कूमूं कहा जाता था।
बाद में चंद शासकों के राज्य विस्तार के साथ कूर्मांचल को वर्तमान कुमाऊं कमिश्नरी के नाम से जाना जाने लगा मगर इलाके की आम बोलचाल में कूमूं और कुमईयां का अर्थ आज भी चंपावत और चंपावत के वाशिंदों से ही माना जाता है।
वायु पुराण में चंपावतपुरी नाम से मिलता है उल्लेख
जोशीमठ के गुरू पादुका नामक ग्रंथ के अनुसार नागों की बहन चंपावती ने चंपावत नगर की बालेश्वर मंदिर के पास प्रतिष्ठा की थी। वायु पुराण में चंपावतपुरी नाम के स्थान का उल्लेख मिलता है, जो नागवंशीय नौ राजाओं की राजधानी थी। चंपावत का संबंध द्वापर युग में महाभारत काल से भी माना जाता है।
मान्यता है कि 14 वर्षों के निर्वासन काल के दौरान पांडव यहां आए थे। चंपावत को द्वापर युग में हिडिंबा राक्षसी से पैदा हुए महाबली भीम के पुत्र घटोत्कच का निवास स्थान भी माना जाता है। चंपावत और इसके आसपास बहुत से मंदिरों का निर्माण महाभारत काल में ही हुआ माना जाता है।