चंपावत। मां पूर्णागिरि धाम के आध्यात्मिक मेले के संचालन को लेकर जिला पंचायत की चेतावनी के बाद से हलचल मची है। वैसे जिला पंचायत ने आरक्षित वन भूमि वाले मेला क्षेत्र में वन भूमि को लीज पर लेने के लिए भी कवायद की। लेकिन लीज की पत्रावली में वन अनापत्ति नहीं मिल पाने से तीन साल से मामला लटका हुआ है। और अब जिला पंचायत फिर से इस मामले को आगे बढ़ाएगी।
बूम से मुख्य मंदिर तक का 12 किलोमीटर के पूर्णागिरि मेले क्षेत्र का करीब 95 प्रतिशत वन क्षेत्र है। आरक्षित वन क्षेत्र में गैर वानिकी गतिविधियों पर 2010 से लगी रोक से पंचायत को मेले के आयोजन में दिक्कतेें आ रही है। साथ ही इससे मेला क्षेत्र में हर साल आने वाले 25 लाख श्रद्धालुओं को सुविधाओं की कमी से भी जूझना पड़ता है।
इसके उपाय के रूप में जिला पंचायत ने 2018 में पूर्णागिरि क्षेत्र की वन भूमि को लीज पर लेने के लिए प्रस्ताव तैयार किया। जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी राजेश कुमार ने बताया कि पंचायत ने 0.958 हेक्टेयर क्षेत्र वन भूमि को 99 साल के लीज पर लेने का प्रस्ताव तैयार किया था। लीज की इस जमीन का उपयोग अस्थाई यात्री शेड, पार्किंग, सरकारी कार्यालय, आवासीय व्यवस्था, स्वास्थ्य शिविर, अस्थाई थाना, फायर स्टेशन आदि के लिए किया जाना प्रस्तावित किया। जिला पंचायत का कहना है कि लीज में जमीन मिलने से तीर्थयात्रियों को सुविधाएं दी जा सकेगी। लेकिन इस प्रस्ताव को अभी हरी झंडी नहीं मिल सकी है।
कोट
जिला पंचायत ने 2018 में 0.958 हेक्टेयर जमीन की लीज का प्रस्ताव वन विभाग को भेजा। लेकिन दो बार आपत्ति लगाकर विभाग ने प्रस्ताव वापस कर दिया। दोनों बार आपत्तियों को दूर कर फिर से प्रस्ताव दिया गया, लेकिन अभी तक वन अनापत्ति दूर नहीं हो सकी है। अब पंचायत फिर से लीज भूमि के मामले को आगे बढ़ाएगी।
राजेश कुमार,
अपर मुख्य अधिकारी।
कोट
चंपावत जिले को पहचान देने वाले मां पूर्णागिरि धाम के मेले का जिला पंचायत पिछले साल तक संचालन करते रही है। संसाधनों की कमी के बावजूद पंचायत ने तीर्थयात्रियों को अधिक से अधिक सुविधा देने का प्रयास किया, लेकिन अब पंचायत कमजोर माली हालत के मद्देनजर वित्तीय संसाधनों के बगैर मेले का संचालन नहीं करेगा। पंचायत मेला तभी कराएगा, जब मेले की व्यवस्था के लिए होने वाले ठेकों से मिलनी वाली जिला पंचायत की निधि में जमा की जाएगी।
ज्योति राय, अध्यक्ष, जिला पंचायत।
2012 से शासन से नहीं मिला मेला अनुदान
चंपावत जिले के सबसे बड़े मां पूर्णागिरि धाम के मेले में 2008 तक नियमित रूप से प्रदेश सरकार मेला अनुदान देती थी। राज्य बनने के बाद हुए पहले सरकारी मेले में 2001 में 22 लाख रुपये अनुदान मिला था। जो 2008 तक घटकर 15 लाख तक पहुंचा। 2009 और 2010 में मेले के लिए सरकारी अनुदान नहीं मिला। मेले के लिए आखिरी बार प्रदेश सरकार ने पांच लाख रुपये का अनुदान 2011 में दिया। और 2012 से कभी भी मेला अनुदान नहीं मिला है।