जंगलों का फायर सीजन 15 फरवरी से शुरू हो गया है। जाड़ों में इस बार खास बारिश न होने और बढ़ती तपिश से जंगल में अधिक खतरे का अंदेशा जताया जा रहा है। पिछले साल जंगल की आग की हुई वारदातें भी एक दशक में सबसे ज्यादा हुई, लेकिन अभी तक विभाग की तैयारी भी पूरी नहीं हो सकी है। यहां तक कि जिला अग्नि सुरक्षा समिति की तैयारी बैठक नहीं हो पाई है।
चंपावत जिले में 62098.32 हेक्टेयर आरक्षित वन क्षेत्र के अलावा 36780.563 हेक्टेयर पंचायती वन और 22815.7 हेक्टेयर सिविल वन हैं। बूम, देवीधुरा और भिंगराड़ा रेंज संवेदनशील वन क्षेत्र हैं। पहाड़ी इलाकों के वन में चीड़ तथा मैदानी हिस्से में बूम में साल के पेड़ और वन्य जंतु आग के नजरिए से खास संवेदनशील है। पिछले साल भी जंगल की आग की 62 घटनाओं में 137.5 हेक्टेयर वन क्षेत्र को नुकसान हुआ है।
वन पंचायत सरपंच संगठन के दीपक बोहरा आदि का कहना है कि इस बार जाड़ों में पर्याप्त बारिश नहीं होने से तपिश बढ़ने की आशंका है। और इसकी मार जंगलों पर पड़ सकती है। ऐसे में 15 जून तक के फायर सीजन के दौर में जंगलों की सुरक्षा के लिए पुख्ता व्यवस्था जरूरी है, लेकिन अभी तक जिला अग्नि सुरक्षा समिति की बैठक नहीं हुई है।
संवेदनशील है चीड़ बाहुल्य जंगल
चंपावत जिले में छह में से तीन रेंज जंगल की आग के नजरिए से संवेदनशीलता के दायरे में है। संवेदनशील वन क्षेत्र बूम, देवीधुरा एवं भिंगराड़ा रेंज के हैं। पहाड़ी इलाकों के वन में चीड़ एवं मैदानी हिस्से में बूम में साल के पेड़ और वन्य जंतु आग के नजरिए से संवेदनशील है। देवीधुरा रेंज के संवेदनशील वन क्षेत्र में जून 2014 को जंगल की आग बुझाने के दौरान एक श्रमिक की मौत भी हो चुकी है।
चुनाव की वजह से जिला अग्नि सुरक्षा समिति की बैठक नहीं हो सकी है। ये बैठक 21 फरवरी को रखी गई है। वहीं जंगल को आग से बचाव के लिए विभिन्न कार्ययोजना तैयार कर ली गई है। हर सेक्शन में वन दरोगा और वन रक्षक के नेतृत्व में क्रू स्टेशन स्थापित किया गया है।
-एके गुप्ता, प्रभागीय वनाधिकारी, चंपावत।
एक दशक में जंगल की आग की घटनाएं
वर्ष घटनाएं प्रभावित क्षेत्र (हेक्टेयर में)
2007 7 18
2008 28 56
2009 33 71
2010 17 47
2011 05 06
2012 25 56
2013 01 02
2014 15 40
2015 13 15
2016 62 137.5