लोगों के मुद्दों को सहजता से उठाता है सिनेमा
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रचनात्मक शिक्षक मंडल द्वारा निकाली जा रही सिनेमा यात्रा रविवार को लोहाघाट पहुंची। सिनेमा यात्रा टीम ने शिक्षकों और बच्चों को फिल्में दिखाने के साथ-साथ सिनेमा के इतिहास, भाषा, तकनीक और सिनेमा से आम आदमी के रिश्ते पर परिचर्चा की।
शिक्षक भवन लोहाघाट में हुए कार्यक्रम में प्रतिरोध का सिनेमा के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने कहा कि 1895 में पेरिस में लुमिये भाइयों द्वारा सबसे पहले चलती तस्वीरों को दिखाने के 121 साल बाद सिनेमा की दुनियां बदल गई है। बीते 15 वर्षो में सिनेमा महंगा था, पर अब डिजीटल युग की शुरुआत से सिनेमा बनाना और दिखाना सस्ता हुआ है।
राज्य संयोजक नवेंदु मठपाल ने फिल्मों से समाज को होने वाले नफे और नुकसान की जानकारी दी। टीम ने उत्तराखंड की होटल संस्कृति को जनजीवन और बच्चों पर पड़ रहे दुष्प्रभावों से रूबरू कराने वाली फिल्म ‘हंसा’ और जन स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के लिए तपन सिन्हा निर्देशित ‘पहली आवाज’ फिल्म दिखाई गई। इस दौरान टीम ने सत्यजीत रे की ‘पंथेर पंचाली’ व गीतांजली राव की ‘प्रिंटेट रेनबो’ और आदिवासी समाज के जीवन को दशार्ती ‘बीजू टोप्पो’ और मेघनाथ की फिल्म ‘गाड़ी लोहरदगा मेल’, सूर्यशंकर की उड़ीसा के जंगलों को बचाने के लिए जारी मुहिम को दर्शाती फिल्म ‘राजा का विलाप’ फिल्म दिखाई गई।
इस मौके पर प्राथमिक शिक्षक संघ जिलाध्यक्ष गोविंद बोहरा, राजकीय शिक्षक संघ जिलाध्यक्ष पान सिंह मेहता, मंत्री जगदीश अधिकारी, आनंद ओली, कुंवर प्रथोली, इंद्रलाल वर्मा, महेश उप्रेती, पान सिंह चमलेगी, पल्लव जोशी, शिवनाथ, सरिता प्रथोली, अनीता चंद, चंद्र सिंह अधिकारी के अलावा बड़ी संख्या में बच्चे मौजूद थे।