सैकड़ों लोगों को रोजगार दे रही फूलों की खेती अब सिमटने लगी है। कोटा, रौलमेल, पिपलाटी, भिंगराड़ा, सलना समेत 12 से अधिक गांवों में लोगों ने फूलों की खेती को अपनी आजीविका का जरिया बनाने की कोशिश की।
दरअसल शुरुआत में दिल्ली के व्यापारियों ने यहां जमीन किराए में लेकर भूस्वामियों से ही फूल का उत्पादन शुरू करवाया। करीब पांच वर्ष तक यह काम दिल्ली के लोगों द्वारा किया जाता रहा। बाद में जो लोग इस कार्य से जुड़े थे, उन्होंने स्वयं इस कार्य को अपने हाथों में ले लिया। देखादेखी अन्य लोग भी इसका उत्पादन करने लगे। उद्यान विभाग की ओर से हल्द्वानी में फूलों की मंडी स्थापित करने की पहल के बाद इस व्यवसाय से जुड़े लोग उत्साहित तो हुए, लेकिन मंडी न खुलने से उनका यह व्यवसाय लड़खड़ाने लगा। यहां से रोडवेज या प्राइवेट वाहनों से फूल काठगोदाम भेजकर वहां से दिल्ली जाने लगे।
जहां कनाट प्लेस की फूल मंडी में यहां के फूल अपनी अलग खुशबू बिखेरते थे, लेकिन ट्रांसपोर्ट का खर्चा अधिक आने के कारण फूल उत्पादकों के लिए यह घाटे का सौदा बन गया है। अब कोटा के अलावा सभी गांवों में फूल उत्पादन का कार्य लोग छोड़ चुके हैं। प्रमुख पुष्प उत्पादक पूर्णानंद भट्ट का कहना है कि उनका परिवार 40 नाली जमीन में फूलों की खेती करता है। डीएचओ डॉ. तिवारी ने यहां आकर उन्हें प्रोत्साहित भी किया। पिछले वर्ष फूलों का बीज भी मुफ्त दिलाया लेकिन इस वर्ष बारिश न होने के कारण फूलों का बीज उगा नहीं है।
सिंचाई सुविधा न होने से बढ़ी दिक्कतें
पुष्प उत्पादक गांव कोटा में सिंचाई की भी कोई सुविधा नहीं है। बगड़ नाले से जहां लिफ्ट सिंचाई योजना बनाई जा सकती है, वहीं डेढ़ किमी दूर कोरा गाड़ से हाइड्रम के जरिए बड़ेत, कोटा, मैरोली गांव में सिंचाई हो सकती है। इसी प्रकार 150 मीटर की दूरी से नल द्वारा पानी लाकर हॉज में डाला जा सकता है, लेकिन इन कार्यों के लिए सरकार द्वारा कोई मदद नहीं मिल रही है।