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सेब नहीं अब होने लगे हैं सिटरस फल

Fri, 04 Dec 2015 10:04 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लोहाघाट
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मौसम चक्र में परिवर्तन आने से अब क्षेत्र में सेब के स्थान पर सिटरस फलों का व्यापक उत्पादन होने लगा है। पहले इस क्षेत्र में डेलीसस, फैनी, राइमर, अर्ली सनवरी, वकिंगम, जौनाथन, रेड बोल्ड, गोल्डन डेलीसस, विंटर बनाना आदि प्रजातियों के सेबों का व्यापक उत्पादन होता था।
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सेब के लिए शीतकाल के दौरान शून्य से नीचे तापमान की आवश्यकता होती है, लेकिन पिछले 10 से 15 वर्षों के बीच तापमान में वृद्धि होने के कारण अब खेतीखान और देवीधुरा को छोड़कर डेलीसस प्रजाति का सेब पैदा नहीं हो पा रहा है। अन्य प्रजातियां जो हो रही हैं, उनका उत्पादन रसातल में पहुंच गया है। रायनगर चौड़ी के स्वर्गीय प्रेमबल्लभ राय का सेब का बगीचा खासा उत्पादन देता था, आज यह पूरी तरह उजड़ गया है। इस बाग में तीन सौ ग्राम वजनी डेलीसस का उत्पादन हुआ करता था।

सेब के स्थान पर अब लोग अब माल्टा, संतरा और नींबू का उत्पादन करने लगे हैं। पंतनगर कृषि विज्ञान केंद्र ने पूर्व में नई प्रजाति के माल्टा के पौध लोगों को उपलब्ध कराए थे, जो आज पूर्ण विकसित हो गए हैं। हालांकि समय पर वर्षा न होने के कारण इसके उत्पादन पर काफी प्रभाव पड़ता आ रहा है। बाजार में भी माल्टा की सरकारी खरीद का कोई केंद्र न होने से बिचौलिए पांच से आठ रुपये किलो की दर से इसे खरीद रहे हैं।
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डीएचओ ने किया निरीक्षण
इस वर्ष खीड़ी, खडनौला आदि स्थानों पर सिटरस प्रजाति के पेड़ों में लगे रोग का डीएचओ एचसी तिवारी ने निरीक्षण किया। उनका कहना है कि नींबू प्रजाति के पेड़ों में रोग फैलने से पैदावार प्रभावित हुई है। उन्होंने किसानों को सुझाव दिया कि वे अनिवार्य रूप से मृदा परीक्षण करने के बाद पौधों का इलाज करें। जलवायु परिवर्तन का भी इसमें काफी प्रभाव पड़ा है। इस वर्ष अन्य स्थानों पर माल्टा का काफी उत्पादन होने से उसका दाना छोटा पैदा हुआ है।
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