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नौकरी छोड़ घाटे की खेती को मुनाफे में बदला

Fri, 22 Dec 2017 10:13 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो चंपावत
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लोहाघाट के महेश राय के पॉलीहाउस में लहलहाती पालक की फसल। - फोटो : अमर उजाला
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 खेती में लगातार हो रहे घाटे के चलते देश के विभिन्न राज्यों में हर दिन औसतन 144 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ये आंकड़ा घाटे की खेती की एक बानगी है। मगर चंपावत जिले में कुछ काश्तकार ऐसे भी हैं, जिन्होंने माटी से नाता जोड़ते हुए खेत में फसलों को लहलहाया है, इससे मुनाफा भी कमा रहे हैं। लोहाघाट विकासखंड के रायनगर चौड़ी के काश्तकार महेश चंद्र राय ने यह कर दिखाया है। निजी क्षेत्र की नौकरी छोड़ नए अंदाज में गेहूं व साक-भाजी की खेती कर अब सालाना 1.10 लाख रुपये की आमदनी कर रहे हैं।
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48 साल के महेश चंद्र राय बंगलूरू व दिल्ली में निजी क्षेत्र में काम करते थे। लेकिन यहां के काम के बजाय उन्होंने घर वापसी कर खेती में मेहनत करने की ठानी। 2011 में घर लौटने पर उन्होंने करीब पांच नाली जमीन में सब्जी की खेती की। पालक, मैथी, पत्ता गोभी, फूल गोभी, शिमला मिर्च, कद्दू और आलू की खेती की। पहले ही साल बंपर पैदावार भी हुई। इसके लिए उन्होंने सरकारी बीज के बजाय पंतनगर से बीज मंगवाए। अधिक से अधिक गोबर की खाद का उपयोग किया। पाले से फसल को बचाने के लिए खेत को प्लास्टिक की पन्नी से ढका।  पानी की कमी न हो, इसके लिए लोहावती नदी से पानी पंप के जरिये खेतों में पहुंचाकर सिंचाई की व्यवस्था की।

बेहतर कीमत के लिए फसल को निर्धारित समय से पहले उगाकर अधिक दाम पाया। राय बताते हैं कि फसल को जानवरों से बचने के लिए रतजगा भी किया। और इन सबका नतीजा यह रहा कि अब वह साल भर में 1.10 लाख रुपये से अधिक का मुनाफा कमा रहे हैं। राय बताते हैं कि विभागीय तौर पर उन्हें एक पॉलीहाउस और एक छोटा ट्रैक्टर मिला। अब उनके इस प्रयास से आसपास के लोगों का रुझान भी खेती की ओर बढ़ रहा है। मुख्य कृषि अधिकारी एस कुमार का कहना है कि प्रगतिशील काश्तकारों की मदद के लिए उनकी मांग पर जरूरी मदद करेगा।
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राज्य बनने के बाद से 7 प्रतिशत काश्तकारों ने छोड़ दी खेती 
चंपावत। जिले में न खेती का रकवा बढ़ रहा है और नहीं खेती करने वाले। उल्टा राज्य बनने के बाद सात प्रतिशत काश्तकारों ने खेती से नाता तोड़ दिया है। सबसे अधिक बोई जानी वाली गेहूं व धान की खेती में ही भारी गिरावट आई है।
कृषि विभाग के मुताबिक उत्तराखंड राज्य बनने के वक्त जिले में 34378 काश्तकार थे। जो अब घटकर 31971 रह गए हैं। इस अवधि में 7 प्रतिशत लोगों ने खेती से नाता तोड़ लिया। 

काश्तकारों के कम होने का असर खेती के रकवे और उत्पादन पर भी पड़ा। सबसे अधिक बोई जाने वाली गेहूं और धान की खेती में ही भारी गिरावट आई है। छह वर्षोें में धान की खेती के रकवे में 29.82 प्रतिशत और उत्पादन में 14.64 प्रतिशत की कमी आई है। इसी अवधि में गेहूं की खेती के रकवे में 31.44 प्रतिशत और उत्पादन में 40.24 प्रतिशत की गिरावट हुई है। किसानों की संख्या में कमी के बीच कृषि आधारित मजदूरों की संख्या में जरूर इजाफा हुआ है। राज्य बनने के समय कृषि पर आश्रित मजदूर 520 थी, जो अब बढ़कर 1980 हो गई है।

किसानों का कहना है कि सिंचित एरिया की कमी से खेती को प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है। इसके अलावा सुअर सहित अन्य जंगली जानवर किसानों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बने हुए हैं। इन दिक्कतों को दूर करे बगैर खेती को बढ़ावा बेहद कठिन होगा। मुख्य कृषि अधिकारी एस कुमार का कहना है कि खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों की आमदनी में वृद्धि की कार्ययोजना तैयार की जा रही है।
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वर्ष      फसल        क्षेत्रफल (हेक्टेयर)    उत्पादन (मैट्रिक टन में)
2010    धान              7216                    7455
2016    धान              5064                     6363
2010     गेहूं              9435                     11861
2016     गेहूं              6848                      7088
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