लोहाघाट (चंपावत)। गुमदेश का ऐतिहासिक चैतोला मेला कुमाऊं में मनाए जाने वाले अन्य मेलों से अलग पहचान बनाए हुए है। रामनवमी से शुरू होने वाले इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां कोई होटल नहीं खुलता है। अतिथि सत्कार करना यहां के लोगों का धर्म रहा है। मान्यता है कि जब पांडव अपने उत्तराखंड प्रवास के दौरान पंचेश्वर में पहुंचे तो उन्होंने पवित्र सरयू नदी में स्नान कर यहां शिव मंदिर के निर्माण का निर्णय लिया। पांडवों ने यहां से चारों दिशाओं में कई बाण छोड़े, पर कोई बाण नहीं रुका।
अंत में कुंती ने अपने आंचल में एक बाण रोक दिया और इस स्थान का नाम रुकमीचौड़ रखा गया और यहां शिव शक्ति की स्थापना की गई। कत्यूर राजा के बाद शिव के अनन्य भक्त चमू ने यहां राज किया। चमू सात भाई थे। आज भी चमदेवल, निडिल, पंचेश्वर, नेपाल के धामकुडी, संतोला में चमू देवता के मंदिर में स्थापित हैं। इन्हीं चमू देवता के समय में एक महाबली दैत्य वकासुर का आतंक था, जो घूमते घूमते रुकमीचौड़ पहुंचा और लोगों में कहर ढाया। दैत्य के आतंक से हर रोज एक नल बलि होने लगी।
इकलौते पौत्र की बारी आने पर कोकिला नामक वृद्धा ने चमू देवता के सामने नतमस्तक होकर पौत्र की रक्षा की विनती की। वृद्धा की पुकार सुनकर चमू देवता ने केदार के बलशाली पुत्रों की सहायता से दैत्य का वध कर दिया। इस स्थान को पस्यारा के नाम से जाना जाता है। दैत्य के वध से रुकमीचौड़ में खुशी में लोग लाठी लेकर नाचने लगे। चमे के नाम से यहां का नामकरण चमदेवल रखा गया। उसके पराक्रम और न्याय की ख्याति चारों तरफ फैल गई। जिन्हें लोग चौखाम कहने लगे। तब से चैत्र नवरात्र में यहां मेला लगता है।
लोहाघाट (चंपावत)। विधायक पूरन सिंह फर्त्याल 15 अप्रैल को सुबह 11 बजे चैतोला मेले का शुभारंभ करेंगे। यहां के गांवों में झोड़ा, ढुस्के, चांचरी का गायन किया जा रहा है। आयोजन समिति के अध्यक्ष कुंवर सिंह प्रथोली के अनुसार मेला स्थल में लगे दोनों हैंडपंप खराब होने के चलते यहां पेयजल किल्लत बनी हुई है, जबकि नेवलटुकरा, जिंडी, जाख, जड, कलौता गांवों में भी पेयजल संकट है। मेले को लेकर प्रवासी लोगों के यहां आने का क्रम शुरू हो गया है।