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बग्वाल युद्ध के लिए तैयार होने लगी हैं खाम सेनाएं

Thu, 11 Aug 2016 10:47 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंपावत
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देवीधुरा मेले में बग्वाल के दौरान इन्हीं फर्रों से होता है बचाव। पाश्र्व में मां बाराही मंदिर। - फोटो : अमर उजाला
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बाराही धाम देवीधुरा में 18 अगस्त को होने वाले बग्वाल युद्ध के लिए चार खामों (गहरवाल, चम्याल, वालिक और लमगड़िया) की सेनाएं एक बार फिर से तैयार होने लगी हैं। इसके तहत लमगड़िया खाम के योद्धा पीली पगड़ी, वालिक खाम के योद्धा सफेद, चम्याल खाम के योद्धा गुलाबी, गहरवाल खाम के योद्धा केसरिया पगड़ी पहनेंगे। इसकी तैयारी इन दिनों की जा रही है। बग्वाल 18 अगस्त को होगी। 13 के बाद से बग्वाल के फर्रों की सफाई एवं उनको दुरुस्त करने का काम भी शुरू होगा।
इसके साथ ही यहां का ऐतिहासिक खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ मैदान एक बार फिर से बग्वाल युद्ध के लिए सजने लगा है। इस मैदान में रक्षाबंधन के दिन पाषाण युद्ध की अनूठी सांस्कृतिक परंपरा एक बार फिर से जीवंत रूप लेगी। देवीधुरा की बग्वाल यहां के लोगों की धार्मिक मान्यता का पवित्र रूप होने के साथ ही सामाजिक व्यवस्था का अध्ययन करने की विषय वस्तु भी है। एक वृद्धा के पौत्र का जीवन बचाने के लिए यहां की चारों खामों की विभिन्न जातियों के लोग आपस में किस प्रकार खून बहाते हैं। यह सामाजिक सद्भाव के नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण है। 
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क्षेत्र में रहने वाली विभिन्न जातियों में से चार प्रमुख खाम चम्याल, वालिक, गहरवाल और लमगड़िया खाम के लोग पूर्णिमा के दिन पूजा अर्चना कर एक दूसरे को बग्वाल का निमंत्रण देते हैं। माना जाता है कि पूर्व में यहां नरबलि दिए जाने की रीति थी, लेकिन जब चम्याल खाम की एक वृद्धा के एकमात्र पौत्र की बलि के लिए बारी आई तो वंश नाश के डर से उसने मां बाराही की तपस्या की। माता के प्रसन्न होने पर वृद्धा की सलाह पर चारों खामों के मुखियाओं ने आपस में युद्ध कर एक मानव बलि के बराबर रक्त बहाकर पूजा करने की बात स्वीकार ली। तभी से ही बग्वाल का सिलसिला चला आ रहा है।




रणबांकुरों को करनी पड़ती हैं विशेष तैयारियां
चंपावत। बग्वाल में भाग लेने के लिए रणबांकुरों को खानपान के साथ ही बग्वाल खेलने के लिए विशेष तैयारियां करनी होती हैं। बग्वाल स्वच्छ कपड़े पहनकर लाठी और रिंगाल की बनी ढाल के फर्रे से खेली जाती है। सुरक्षा के लिए मैदान में फर्रो तथा लाठियों को सटाकर कवच बनाया जाता है। स्वयं को बचाकर दूसरे दल की ओर से फेंके गए पत्थर को दोबारा से दूसरी तरफ फेंकना ही बग्वाल कहलाता है।

देश-विदेश से पहुंचते हैं प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु
चंपावत। अतीत से ही आषाड़ी कौतिक के नाम से मशहूर बग्वाल को देखने प्रतिवर्ष देश-विदेश के हजारों पर्यटक तथा श्रद्धालु देवीधुरा पहुंचते हैं। मेला अवधि में क्षेत्र की लोक कलाओं के प्रदर्शन के अलावा धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी चरम पर रहता है। इस बार मेले का शुभारंभ 14 अगस्त को होगा, मुख्य आकर्षण बग्वाल युद्ध 18 अगस्त को होगी।


तीन सालों से फल और फूलों से हो रही है बग्वाल
चंपावत। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद बीते तीन सालों से बग्वाल युद्ध में पत्थरों के स्थान पर फल और फूलों का प्रयोग भी होने लगा है। अलबत्ता फल और फूलों से शुरू होने वाली बग्वाल कुछ ही समय बाद पत्थरों की बरसात में तब्दील हो जाती है।
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स्पीकर कुंजवाल 14 को देवीधुरा में
चंपावत। विधानसभा स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल 14 अगस्त को जिले के भ्रमण पर रहेंगे। जिला कार्यालय की प्रभारी अधिकारी सीमा विश्वकर्मा ने बताया कि स्पीकर 14 अगस्त को जैंती से प्रस्थान कर 11 बजे देवीधुरा पहुंचकर उत्तर भारत के प्रसिद्ध बग्वाल मेले के उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में प्रतिभाग करेंगे। उसके बाद वह तीन बजे देवीधुरा से हल्द्वानी के लिए प्रस्थान करेंगे।
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