देवीधुरा की ख्याति भले ही बग्वाल के लिए हो, लेकिन यहां की मां बाराही देवी मूर्ति और भीम शिला का रहस्य भी बेहद रोचक है। बाराही देवी मंदिर परिसर में एक ताम्रपेटिका में रखी मूर्ति को नहीं देखने की परंपरा रही है। इसके भीतर रखी मूर्ति को किसी भी श्रद्धालु ने अब तक नहीं देखा है। केवल मंदिर के पुजारी द्वारा मेले के दौरान नेत्रों को ढककर मूर्ति का स्नान कराने की परिपाटी रही है।
मंदिर में प्रवेश करने पर सर्वप्रथम एक मूर्ति है, जिसे 52 पीठों में से एक माना जाता है। मुख्य मंदिर में तांबे की पेटिका में मां बाराही देवी की मूर्ति है, मगर पेटिका में रखी इस देवी मूर्ति के दर्शन अभी तक किसी ने नहीं किए हैं। इस कारण यह भी साफ नहीं कि यह मूर्ति किस धातु की है। हर साल केवल भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा को पंडित पुरोहित पुजारियों और बागड़ जाति के व्यक्ति द्वारा ताम्र पेटिका को मुख्य मंदिर से नंद घर में लाया जाता है, जहां आंखों में पट्टी बांध कर मां को स्नान कराने के बाद उनको आभूषण और नए परिधान पहनाए जाते हैं। इस पेटिका में मां वज्र बाराही के अलावा मां महाकाली और मां सरस्वती की मूर्तियां भी हैं।
वज्र के समान तेज हैं मूर्ति
मंदिर के पीठाचार्य कीर्ति शास्त्री का कहना है कि मां वज्र बाराही, मां सरस्वती एवं मां महाकाली में वज्र के समान तेज है, जिससे उन्हें खुली आंखों से नहीं देखा जाता है। यह भी कहा जाता है कि दिगंबरा होने के कारण मां की मूर्ति को बंद रखा जाता है। मां बाराही उग्र देवी हैं, वह अशुद्ध पाप कर्म और दुरात्माओं को सहन नहीं करती हैं। शायद पाप वृत्ति वालों से उन्हें दूर रखने का प्रयास किया गया होगा। मां बाराही धाम में मां वज्र बाराही की स्थापना का कोई इतिहास उपलब्ध नहीं है। अलबत्ता देवी यहां के लोगों की सदियों से ईष्ट है।
भगवान विष्णु की शक्ति है मां बाराही
पुराणों के जानकार और संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य भुवन चंद्र जोशी का कहना है कि पुराणों में मां बाराही को भगवान विष्णु की शक्ति माना गया है। विष्णु भगवान जब बाराह, नर सिंह आदि रूप में अवतार लेते हैं तो महालक्ष्मी बाराही, नारसिंही आदि रूप में अवतरित होती हैं। श्रीविद्यार्णवतंत्र में बाराह मूर्तिर्वाराही नृसिंहा सिंहविक्रमा। मां बाराही को देवीभागवत तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में विष्णु के बाराह अवतार की पत्नी बताया गया है, जो काफी तेजस्वी हैं।