मां बाराही धाम देवीधुरा में आषाढ़ी कौतिक (बृहस्पतिवार) के दिन बग्वाल मेला होगा। प्रशासन ने मेले की सारी तैयारियां पूरी कर ली हैं। मेला कमेटी के कोषाध्यक्ष कीर्ति बल्लभ जोशी ने बताया कि मुख्य प्रांगण (खोलीखांड दुबाचौड़) में बग्वाल को लेकर सभी व्यवस्थाएं पूरी हो चुकी हैं। मेले में फलों की व्यवस्था हर बार की तरह लोहाघाट के ब्लॉक प्रमुख योगेश मेहता कर रहे हैं। हनुमान मंदिर से मुख्य मंदिर तक वाहनों के जाने में पूर्णतया प्रतिबंध रहेगा।
मेला मजिस्ट्रेट निर्मला बिष्ट ने बताया कि जीर्ण अवस्था में पड़े मकानों को चिन्हित कर उसके ऊपर लाल झंडे लगा दिए गए हैं तथा सुरक्षा की दृष्टि से मकानों में एक-एक पुलिस कर्मी को नियुक्त कर दिया गया है। रोडवेज बग्वाल के मद्देनजर छह अतिरिक्त बसें यहां चलाएगा। एआरटीओ वीके सिंह ने बताया कि सभी वाहनों में किराया सूची चस्पा करना अनिवार्य किया गया है।
चप्पे-चप्पे में हिफाजत
देवीधुरा। बृहस्पतिवार को खोलीखांड दुबचौड़ा मैदान में होने वाले बग्वाल में उमड़ने वाली भारी भीड़ के मद्देनजर चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा के बंदोबस्त किए गए हैं। पुलिस अधीक्षक दिलीप सिंह कुंवर ने बताया कि सुरक्षा की कमान दो पुलिस क्षेत्राधिकारियों को दी गई है। पाटी थाने के अलावा जिले के छह थानों के थानेदारों के तैनात किए गए हैं। एक कंपनी पीएसी लगाई गई है। मैदान और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर 18 सीसीटीवी लगाए गए हैं। लंबी दूरी को छोड़कर अन्य वाहनों की आवाजाही को देवीधुरा से दो किलोमीटर पहले रोका जाएगा।
व्यापारी कर रहे हैं अच्छी कमाई की उम्मीद
देवीधुरा। मां बाराही धाम देवीधुरा में दुकानें सजने लगी हैं। बाजार में चहल-पहल बढ़ गई है। साथ ही दूर-दूर गांवों से लोगों का आना शुरू हो गया है। जहां एक ओर व्यापारी इस साल बहुत अच्छी कमाई की उम्मीद कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वह इस बात से खुश हैं कि इस साल जिला पंचायत और मंदिर कमेटी की ओर से किसी प्रकार का टैक्स नहीं लिया जा रहा है।
देवीधुरा में फल-फूल, मगर चमोली में मशालों से होती थी बग्वाल
देवीधुरा की पहचान है बग्वाल। बृहस्पतिवार को इस बग्वाल नगरी में चारों खामों में बग्वाल होगी। 2012 तक पत्थरों से खेली जाने वाली बग्वाल तीन वर्षों से फल और फूलों से खेली जा रही है, लेकिन बग्वाल खेलने का ढंग इससे अलग भी था। गढ़वाल के चमोली जिले में ऐसा ही कुछ होता था, जहां बग्वाल की परंपरा बंद होने से पहले तक इसे मशाल के साथ खेला जाता था।
इतिहासकार एवं राजकीय महाविद्यालय के प्राचार्य रहे डा.मदन चंद्र भट्ट का कहना है कि देवीधुरा की बग्वाल के मूल में धार्मिक आस्था ही धुरी रहा है, लेकिन अन्य जगहों की बग्वाल में धार्मिक भावना से ज्यादा अर्थ एवं राजनीति रही है। डॉ.भट्ट के मुताबिक चमोली में बग्वाल खेले जाने का ढंग एकदम अलग था। यहां पाषाण युद्ध का भी रिवाज नहीं था। इस इलाके में बग्वाल मशालों से खेली जाती थी और बग्वाल खेलने के वक्त में भी फर्क था।
करीब दो सौ साल पहले तक सिर्फ देवीधुरा ही नहीं, बल्कि 19 और जगहों में भी बग्वाल की परंपरा थी। दस दसै, बीसी बग्वाल की लोकोक्ति के जरिए भी पर्वतीय इलाकों में बग्वाल की प्रथा की तस्दीक होती है। ब्रिटिश प्रभुत्व की कुमाऊं पर स्थापना होने तक पुलहिंडोला के चमदेवल में बग्वाल खेलने की गौरवशाली परंपरा रही है। बग्वालीचौड़, गुमदेश, बग्वाली, पोखर, सिवौली के रावत, चमोली के गांवों में बग्वाल की प्रथा रही है।