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संकट में साहूकारों ने नहीं दिया साथ:प्रवासियों की आपबीती

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चंपावत। हरियाणा के फरीदाबाद में होटल में काम करने वाले भरत सिंह घर वापसी से खुश हैं। लॉकडाउन के दौरान के फरीदाबाद के अनुभव उसमें सिहरन पैदा करते हैं। कहते हैं कि लॉकडाउन में शुरू के कुछ दिनों के बाद मालिक ने खाने में कोई मदद नहीं की। खाना व रहना सब कुछ बचे रुपयों से करना पड़ा। वहीं मार्च का पूरा वेतन भी नहीं मिला। कड़ुवे अनुभव से परेशान भरत कहते हैं कि भविष्य में गांव छोड़कर हरियाणा जाना भी पड़ेगा, तो वे पुरानी जगह किसी भी हाल में काम नहीं करेंगे। काम के लिए नई जगह तलाशेंगे।
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सल्ली गांव के रहने वाले 25 साल के भरत सिंह बड़े परिवार के बावजूद अकेले कमाने वाले हैं। सात साल से हरियाणा में काम कर रहे हैं। 12 हजार रुपये महीने के वेतन में काम करने वाले भरत कहते हैं कि लॉकडाउन से काम छीना। 11 अप्रैल से उन्हें व उनके साथियों को खाने के लिए खुद ही व्यवस्था करनी पड़ी। होटल मालिक ने न तो खाना दिया, न रहने की व्यवस्था की और नहीं 24 मार्च के बाद का वेतन दिया। इस व्यवहार से उन्होंने तय किया कि वे अब आगे से ऐसे मालिक के साथ काम नहीं करेंगे, जो आड़े वक्त में मदद न करे।
काम मिला तो जरूर जाऊंगा...
चंपावत। दिल्ली में ड्राइविंग कर घर की गाड़ी चलाने वाले हीरा सिंह को मार्च का वेतन भी पूरा नहीं मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कारोबारियों और उद्यमियों से अपने कामगारों की पगार देने की अपील की थी, लेकिन उनके मालिक ने इस अपील को नहीं माना। और तो और मार्च का वेतन भी कटकर दिया गया। हीरा बताते हैं कि लॉकडाउन में न दिल्ली सरकार ने कोई मदद की और नहीं मालिक ने। अनाज के लिए आवेदन किया, लेकिन मिला नहीं। वेतन व बचत की रकम से गुजारा किया। अब जेब में करीब दो हजार रुपये हैं। घर में रहकर परिवार का गुजर हो पाना आसान नहीं है।
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