चंपावत। मां पूर्णागिरि धाम के मुख्य मंदिर की पहाड़ी की दरारों को भरने के काम मंजूरी के 13 साल बाद भी शुरू नहीं हो सका है। सेतु, सिंचाई एवं स्लोप (पीआईयू) ने इस साल 10 फरवरी को परियोजना का जिम्मा विश्व बैंक की निर्माण शाखा के बेड़ीनाग खंड के बजाय हल्द्वानी को सौंपा था। इसके बाद नई परामर्शदाता एजेंसी ने डिजाइन भी बनाई। उनके सुझावों के अनुरूप काम शुरू करवाने के लिए उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने 31 मई को 395.99 लाख रुपये का अनुमोदन किया, लेकिन अनुमोदन के 15 दिन बाद भी यह राशि नहीं मिल सकी है।
पूर्णागिरि मंदिर शिवालिक क्षेत्र में स्लेटी बलुआ पत्थर वाली चट्टानों में स्थित है। मंदिर की पहाड़ी में बनी दरार की मरम्मत के लिए 13 वर्ष में कई एजेंसियां डीपीआर और डिजाइन बना चुकीं हैं, लेकिन पहाड़ी की संवेदनशीलता और भौगोलिक जटिलता की वजह से काम शुरू तक नहीं हो सका। हालांकि इस साल अप्रैल में पुणे की एक स्वतंत्र परामर्शदाता एजेंसी ने सभी पहलुओं के मद्देनजर डिजाइन बनाई। इसके तहत मंदिर के शिखर से करीब 30 मीटर नीचे तक दरार भरने के अलावा मुख्य मंदिर के पास पैदल मार्ग की चौड़ाई को दो से बढ़ाकर आठ फीट करने का सुझाव दिया गया। जिला पर्यटन विकास अधिकारी लता बिष्ट ने बताया कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने 395.99 लाख रुपये की वित्तीय स्वीकृति का अनुमोदन किया और इस अनुमोदन को स्वीकृति के लिए अल्मोड़ा स्थित अधीक्षण अभियंता कार्यालय भेजा गया, लेकिन फिलहाल बजट नहीं मिल सका है। (संवाद)
एजेंसी बदलने से भी शुरू नहीं हुआ काम
चंपावत। मां पूर्णागिरि धाम के मुख्य मंदिर की पहाड़ी की दरारों को भरने की यह परियोजना 2008 से शुरू हुई। एजेंसी और निर्माण खंड बदलने से भी काम शुरू नहीं हो सका है। सबसे पहले इसका जिम्मा लोनिवि को दिया गया। फिर 2017 में यह काम विश्व बैंक की निर्माण शाखा बेड़ीनाग को दिया गया। अब इस साल फरवरी में बेड़ीनाग से हल्द्वानी खंड स्थानांतरित कर दिया गया है। (संवाद)
मुआयना, सर्वे और भूगर्भीय रिपोर्ट में ही उलझते रहे
चंपावत। मुख्य मंदिर की पहाड़ी में कई जगह करीब पांच इंच चौड़ी दरार है। एनएचपीसी, सीडब्लूसी, वाप्कोस से लेकर कर्नाटक के कोलार की कंपनी, ग्रीस की ओमी कारन कप्पा, पुणे की जैनेस्ट्रो और गुरुग्राम की इंडस कंसल्टेंट कंपनी तक यहां मुआयना और सर्वे कर चुकी हैं। वर्ष 2015 में उत्तराखंड आपदा राहत परियोजना के माध्यम से भी सर्वे कराया गया। भूगर्भीय रिपोर्ट और परामर्शदाता एजेंसियों की रिपोर्ट के बाद तीन बार निविदा निकाली भी गई, लेकिन 9.97 करोड़ रुपये की इस परियोजना का काम शुरू नहीं हो सका। (संवाद)
कोट
मुख्य मंदिर के पीछे के हिस्से का जियोटेक परीक्षण कराया जा चुका है। भूगर्भवेत्ता के सुझावों के आधार पर डीपीआर गठित की गई है और बजट मिलने के बाद निविदा आमंत्रित कराई जाएगी।
- प्रवीण गुरुरानी, ईई, विश्व बैंक निर्माण खंड, हल्द्वानी।