एक ओर राज्य सरकार किसानों की आय दोगुनी करने के दावे कर रही है। दूसरी ओर जिले के गुमदेश क्षेत्र में एक साथ संतरे के पेड़ों में रोग लगने से कई लोगों के मुंह का निवाला छिन गया है।
खीड़ी, सनकाफल, खीड़ीकोट, वायलाखेत, बरनोली, डुंगरी, फटकस्याल, क्वैराली, कोटला, मौड़ा, वनसू, पोखरी आदि गांवों में संतरे के पेड़ लगातार सूखते जा रहे हैं। इन क्षेत्रों की सम जलवायु होने के कारण यहां संतरे का बहुतायत में उत्पादन होता रहा है।
नवंबर से जनवरी माह के बीच यहां के संतरों से लोहाघाट के बिजली घर के सामने मंडी लगा करती थी जो अब समाप्त हो गई है। वैसे मडलक, रौल, धौन, डुंगरी, बिल्दे, रौसाल आदि क्षेत्रों में भी संतरे का व्यापक उत्पादन होता है। यहां भी पेड़ सूख रहे हैं।
प्रमुख संतरा उत्पादक रघुवर कलौनी, हरीश सिंह, शेर सिंह, हीरा सिंह, शेरनाथ, नारायण नाथ, धन गिरी, हयात गिरी, प्रहलाद नाथ, शंकर नाथ, त्रिलोक नाथ, दीवान नाथ, शंकर गिरी, नारायण गिरी आदि का कहना है कि चार साल से यह रोग क्षेत्र में फैला हुआ है जिसमें पहले पेड़ों का ऊपर से सूखना शुरू होता है जो बाद में पूरे पेड़ को ही सुखा देता है। यहां कई लोगों ने सूखे पेड़ों को काटकर लकड़ी बना ली है।
उनका कहना है कि संतरा उत्पादन उनका परंपरागत व्यवसाय रहा है और वे पेड़ों की पूरी देख रेख भी करते आ रहे थे। संतरा उत्पादकों का कहना है कि संतरे की बिक्री से वे अपना साल भर का खर्च चलाते आ रहे हैं। इसके साथ यहां के लोग सब्जी उत्पादन एवं सब्जी पौध उत्पादन का भी कार्य करते हैं। संतरे के पेड़ों के सूखने से उत्पादकों को काफी आर्थिक क्षति हुई है।
पुराने पेड़ों के स्थान पर नए पेड़ लगाएं
लोहाघाट (चंपावत)। जिला उद्यान अधिकारी एनके आर्या का कहना है कि पुराने पेड़ों का सूखना स्वाभाविक है। पेड़ों की जड़ों में जाल लग जाता है। प्रतिवर्ष उन्हें निकालने के साथ जड़ों में खाद पानी देना पड़ता है। फल उत्पादकों ने ऐसा नहीं किया होगा। उन्हें पुराने पेड़ों के स्थान पर अब नए पेड़ लगाने चाहिए।