सेब की पैदावार कभी पहाड़ की पहचान होती थी लेकिन तापमान बढ़ने के बाद से सेब की पैदावार में गिरावट आ रही है। इन हालात के बीच अब एक शिक्षक ने अपने किचन गार्डन में सेब की नई प्रजाति रेड चीफ की पैदावार की है। इस प्रजाति की खूबी है कि ये सेब सर्दियों में हिमपात के बगैर भी बेहतरीन उत्पादन देते हैं। तीन साल में सेब के पौधे फल भी देने लगे हैं।
जिले के पहाड़ी हिस्से में उत्तराखंड बनने से पूर्व तक 447 हेक्टेयर में सेब होता था जिससे 701 मीट्रिक टन का उत्पादन होता था। अब सेब की खेती 323 हेक्टेयर में सिमट गई है। इसमें 328 एमटी का उत्पादन हुआ। तापमान में बदलाव के चलते पहाड़ में सेब के उत्पादन में 124 हेक्टेयर गिरावट हुई।
इसके मद्देनजर राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता शिक्षक डॉ. हरिशंकर गहतोड़ी ने डिलिशियस के बजाय रेड चीफ प्रजातियों के सेब पैदा करने की पहल की। रामगढ़ और यहां के तापमान की समानता के चलते उन्होंने रामगढ़ से दो पौधे खरीदे। डॉ. गहतोड़ी बताते हैं कि उन्होंने 2016 में ये पौधे अपने किचन गार्डन में लगा दिया। इस बार तीसरे साल इन पौधों पर फल आ गए।
बंदरों से बचाव के लिए उनकी पत्नी तुलसी गहतोड़ी पेड़ों की देखरेख करती है। जनवरी में पेड़ों की छंटाई करने के बाद इन पेड़ों को ढाई मीटर से अधिक नहीं बढ़ने दिया। इस साल जुलाई में यहां लाल और पीले रंग का सेब तैयार हुआ, जबकि गहरा लाल और कलेजी रंग का सेब सितंबर प्रथम सप्ताह तक तैयार हुआ। शिक्षक गहतोड़ी के किचन गार्डन में फिलहाल 200 ग्राम वजन के सेब पैदा हो रहे हैं। पेड़ों में कीड़ा लगने पर नमक, हल्दी व सरसों के तेल के पेस्ट से इलाज करते हैं।
सेब की डिलिशियस प्रजाति के लिए 200 घंटे लगातार शून्य से नीचे तापमान की जरूरत होती है। जबकि रेड चीफ, टाइडमैन आदि विदेशों से आयातित सेब की प्रजातियों के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है। इस कारण अब ये प्रजातियां लुभा रही हैं। एनके आर्या, जिला उद्यान अधिकारी, चंपावत।