देवीधुरा में एक साथ बगवाल खेलने वाली चम्याल खाम की तीन पीढ़ी। संवाद न्यूज एजेंसी
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पाटी/देवीधुरा (चंपावत)। मां वाराही धाम की बगवाल आस्था का बेहद नायाब नमूना पेश करती है। साथ ही बगवाल में हिस्सा लेने वालों के बीच उम्र का अंतर भी कोई मायने नहीं रखती। शुक्रवार को खोलीखांण दुबचौड़ा मैदान में हुई बगवाल में भी ऐसा ही नजारा था। एक साथ तीन पीढ़ी बगवाल खेलती नजर आई। चम्याल खाम के बची सिंह सिंग्वाल (80) ने अपने बेटे, भतीजे और दो पोतों के साथ बगवाल में जमकर फल-फूल बरसाए।
बची सिंह अपने बेटे मोहन सिंह (45), बची सिंह के पोते विजय (20) और अमित सिंग्वाल (15) के साथ पूरे नौ मिनट तक खोलीखांण मैदान में बगवाल खेलते रहे। बगवाल के मैदान में उन्हें 29 साल पहले की स्मृतियां भी ताजा हो गई जब 1993 में उन्होंने पहली बार बगवाल खेली।
बताते हैं उस दौर में बगवाल अधिक वक्त तक भी खेली जाती थी और बचाव के लिए फर्रे भी नहीं होते थे लेकिन अब बगवाल का समय कम हो रहा है साथ ही बचाव के लिए बंदोबस्त भी तगड़ा है। बची सिंह कहते हैं कि बगवाल सात्विकता, संयम के साथ आस्था और सकारात्मक जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है। इसी के चलते उनके 15 साल के पोते अमित भी इसमें पूरे जोश-ओ-खरोस ले हिस्सा ले रहे हैं।
देवी दर्शन को उमड़े श्रद्धालु
पाटी/देवीधुरा (चंपावत)। मां वाराही मंदिर में खुशगवार मौसम के बीच शुक्रवार सुबह से ही भक्त उमड़ने शुरू हो गए थे। भीड़ का आलम यह था कि मंदिर से लेकर खोलीखांण दुबचौड़ा तक लोग खचाखच भरे थे। श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रण करने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी।
मन्नत के लिए उठाया एक क्विंटल भारी पत्थर
पाटी/देवीधुरा (चंपावत)। देवीधुरा के खोलीखांण दुबचौड़ा मैदान में एक क्विंटल से अधिक वजन के गोल पत्थर को उठाने के लिए आस्था से सराबोर नौजवानों में होड़ मच गई। शिला उठाने की परंपरा कोरोना की वजह से पिछले दो साल से बंद थी। अलबत्ता इस बार फिर से शुरू हुई इस परंपरा में 57 लोगों ने आस्था के इस भारी भरकम पत्थर को उठाया। कुछ युवाओं ने इसे कंधे पर भी उठा लिया। इक्का दुक्का नौजवान ऐसे भी थे जिन्होंने छाती तक पत्थर को उठाया। कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने पत्थर को लेकर मैदान के एक हिस्से की परिक्रमा भी की। वहीं हैड़ाखान से पहली बार बगवाल देखने आए युवा हरीश ने पांच बार इस विशालकाय पत्थर को उठाया। शिला को लेकर मान्यता है कि इसे उठाने से मनोकामना पूरी होती है। इसी तरह मैदान में बने चक्र के छोटे से हिस्से को भी श्रद्धालुओं ने आरपार किया।