लोहाघाट (चंपावत)। गुमदेश के ऐतिहासिक चैतोला मेले में सदियों से चली आ रही परंपराएं आज भी कायम हैं। आज भी गुमाधुरी राजा को सम्मान देने और उनके आदेशों का पालन करने के लिए चमू देवता अपने रथ से उतरते हैं।
पंडित शंकर दत्त पांडेय, पंडित हरीश कलौनी, जोगा सिंह धौनी बताते हैं कि चमू देवता का दरबार चमदेवल के उत्तर पूर्व दिशा के ठीक सामने गुमकोट स्थान पर था जहां वर्तमान में मां महामाया का मंदिर है। यहां पहले गुमाधुरी राजा का राज्य था। राजा का ऊंची पहाड़ी में अपना किला था। राजा के गुरु गोलदार थे जो उन्हें राजनैतिक सलाह दिया करते थे। राजा और रानी के बीच चमू देवता की आस्था के प्रति मतभेद होने से राजा का सिंहासन डोल उठा।
कहा जाता है कि चैतोला मेले में जब चमू देवता की रथ यात्रा किले के ठीक सामने चौपता और नेवलटुकरा गांवों के बीच से होकर गुजर रही थी उस वक्त राजा ने रानी से कहा कि मैं अच्छा लग रहा हूं या रथ में सवार चमू देवता। तब रानी ने जवाब दिया कि रथ में बैठे चमू देवता। यह सुनते ही राजा ने अपने सैनिकों को चमू देवता को रथ से उतारने का आदेश दिया।
राजा के आदेश का पालन कर चमू देवता रथ से उतर तो गए लेकिन उन्होंने राजा को श्राप दिया कि जिस राज सत्ता व किले का तुम्हें घमंड है वह छह माह के भीतर ध्वस्त हो जाएगा। चमू देवता के श्राप से गुमाधुरी राजा की सत्ता गुम हो गई और इस स्थान का नाम गुमकोट पड़ गया। तभी से यह क्षेत्र गुमदेश के नाम से प्रचलित हो गया।