बनबसा (चंपावत)। भारतीय सेना के महार रेजीमेंट से अवकाश प्राप्त कै.कल्याण चंद ने वर्ष 1971 के युद्ध में अपने शौर्य का प्रदर्शन किया था। उन्होंने करीब दो माह तक मुक्ति वाहिनी के साथ भी कार्य किया था। ‘कल के जवान आज के किसान’ की भूमिका निभाते हुए कै.चंद बनबसा चूनाभट्टा गांव में खेती किसानी करते हैं।
वर्ष 1971 के युद्ध में प्रतिभाग कर चुके सेवानिवृत्त कै.चंद तब हवलदार के पद पर थे। तब उन्हें दो माह तक पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की मुक्ति वाहिनी को सेना के गुर सिखाने में लगाया गया था। इसी बीच उन्हें त्रिपुरा के पास छतनापुर में पाक सैनिकों से लोहा लेने का टास्क मिला। कुछ ही दिन बाद उन्हें तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के शमशेर नगर पहुंचकर पाक सेना को धूल चटानी थी।
जहां उनकी टुकड़ी ने जांबाजी से युद्ध किया, लेकिन तीन दिनों बाद ही युद्ध विराम हो गया। कै.चंद बताते हैं कि उस युद्ध में उनके साथी जवान अनुसुईया प्रसाद शहीद हुए थे, जिन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र दिया गया। वह बताते हैं कि तब आज जैसी सुविधाएं सेना में नही थीं, लेकिन बुलंद हौसलों के साथ सैनिकों को जांबाजी से युद्ध लड़ना होता था। बताते हैं कि युद्ध के उपरांत उन्हें सेना में विभिन्न स्थानों पर तैनात किया गया। वर्ष 1981 में आनरेरी कैप्टन बनने के बाद उन्हें वर्ष 1981 से 83 तक तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. सरदार जैल सिंह की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। वे वर्ष 1958 में भारतीय सेना के सदस्य बने थे।
पिथौरागढ़ के जाजल गांव निवासी कल्याण चंद ने आठवीं तक शिक्षा लेने के बाद 10 महार रेजीमेंट (तब बार्डर स्कार्ट) में भर्ती हुए थे। उन्होंने मध्यप्रदेश के सागर में सेना का प्रशिक्षण लिया और आगे की पढ़ाई भी की। उनका परिवार वर्ष 1970 से बनबसा के चूनाभट्टा में रह रहा है।