जिले के मैदानी हिस्से में गेहूं की पैदावर खूब होती है, लेकिन बिक्री केंद्र में इस बार पहले 15 दिनों में गेहूं के एक भी दाने की आमद नहीं हुई है। तीन वर्षों में गेहूं की खरीद में लगातार कमी आ रही है। वहीं पिछले वर्ष भी गेहूं की खरीद सिफर रही थी।
जिले में पिछले साल 8300 हेक्टेयर एरिया में गेहूं की खेती हुई थी, जिसमें तकरीबन 10800 मीट्रिक टन (एमटी) गेहूं की पैदावार हुई थी। इस पैदावर का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा टनकपुर-बनबसा से हैं, लेकिन बावजूद इसके गेहूं क्रय केंद्रों में किसान गेहूं की बिक्री नहीं कर रहे हैं। किसानों से गेहूं की खरीद के लिए जिले में दो केंद्र खोले गए हैं। पहली अप्रैल से शुरू इन केंद्रों में अब तक गेहूं की खरीद नहीं हो सकी है। इस बार गेहूं 1450 रुपए प्रति क्विंटल की दर पर खरीदा जा रहा है। मगर धन मिलने में देरी और बाजार से कम भाव के चलते किसान यहां गेहूं नहीं दे रहे हैं।
किसानों को लुभा रहा अधिक बाजार भाव
चंपावत। सरकारी केंद्रों से किसानों के मुंह फेरने की कई वजहें हैं। ऊचौलीगोठ के पान सिंह महर, पूर्व प्रधान दीपक चंद, ककरालीगेट के प्रकाश चंद सहित तमाम काश्तकारों का कहना है कि बिक्री केंद्रों की जटिलताएं आम किसान को मुश्किल पैदा करती है। इसके अलावा गेहूं के दाम में बेहद मामूली इजाफा किया गया है, जबकि बाजार में करीब 300 रुपए क्विंटल तक दाम अधिक है और बिक्री केंद्र के कम दाम को पाने के लिए भी किसानों को पापड़ बेलने पड़ते हैं।