चंपावत। उत्तर प्रदेश से अलग होकर अलग राज्य बनने के बावजूद उत्तराखंड में खास बदलाव नहीं आया है। लोगों का कहना है कि इसकी बड़ी वजह पर्वतीय प्रदेश के बावजूद पहाड़ी नजरिए का अभाव होना है। चंपावत की जनता का कहना पहाड़ी प्रदेश की राजधानी पहाड़ में नहीं होना भी पहाड़ के पिछड़ेपन का एक कारण है।
यहां के अधिकांश लोग देहरादून को राजधानी के लिए अनुपयुक्त मानते हुए गैरसैंण के हिमायती हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के बिजनौर व सहारनपुर को उत्तराखंड राज्य में शामिल करने को लेकर सरकार के भीतर से उठी आवाज को यहां के ज्यादातर लोग ठीक नहीं मानते हैं।
गैरसैंण राजधानी बनना जन भावना के अनुकूल
राज्य आंदोलनकारी दीपक तड़ागी लारा का कहना है कि 17 वर्षों तक देहरादून का राजधानी बने रहना पहाड़ी राज्य की मूल भावना का अपमान है। राज्य के लोगों की जन भावना के अनुरूप गैरसैंण को ही राजधानी बनाया जाना चाहिए। अलबत्ता राज्य की सीमा के विस्तार को वे पंचेश्वर बांध विस्थापन के मद्देनजर उचित मानते हैं।
गैरसैंण से पनपेगी धरातली सोच
युवा सूरज प्रहरी का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्र में उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य की राजधानी बनने से शासन की नीतियों में भी धरातली सोच पनपेगी। जितना जल्दी गैरसैंण को राजधानी बनाया जाए, सूबे के लिए उतना ही बेहतर होगा। कहा कि राज्य का सीमा विस्तार प्रदेश के हितों के प्रतिकूल है।
राजधानी पर समग्रता पूर्ण दृष्टिकोण अपनाए
राज्य आंदोलनकारी हिमेश कलखुड़िया का कहना है कि राजधानी को लेकर समग्रतापूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। इसमें भावनाओं का ध्यान रखने के साथ प्रदेश की माली हालत पर भी विचार किया जाए। राज्य की सीमा के विस्तार के लिए हर पहलु पर व्यापक मंथन की जरूरत है।
संघर्ष का प्रतीक है गैरसैंण
राज्य आंदोलनकारी बसंत सिंह तड़ागी कहते हैं कि गैरसैंण उत्तराखंड राज्य निर्माण के संघर्ष का प्रतीक है, जबकि देहरादून अफसरों का शहर है। हम किस नजरिए का प्रदेश चाहते हैं, यह राजधानी के निर्माण से तय होगा। राज्य का सीमा विस्तार पहाड़ी राज्य की अवधारणा के खिलाफ है। इससे विकास और सियासत दोनों मोर्चों पर पहाड़ी इलाके पिछड़ेंगे।