मंगरोली गांव की महिलाओं ने 15 साल पहले चीड़ के जंगल के बीच जिस जगह बांज के पौधे रोपे थे, आज वहां बांज का जंगल खड़ा है। गांव के पास ही मवेशियों के लिए चारापत्ती और खाना पकाने को सूखी लकड़ियां मिलने से अब उन्हें तीन किलोमीटर की दूरी नापने से छुटकारा मिल गया है।
कर्णप्रयाग ब्लॉक स्थित मंगरोली गांव की महिलाओं को क्षेत्र में चीड़ का जंगल होने की वजह से चारा पत्ती और सूखी लकड़ियों के लिए दूर दराज बांज के जंगलों में भटकना पड़ता था। जंगली जानवरों का डर तो था ही।
ऐसे में महिलाओं ने एकत्र होकर 2005 में तत्कालीन ग्राम प्रधान सतेश्वरी देवी की अगुवाई में इस जंगल के बीच खाली स्थान पर बांज के करीब 300 पौधे रोपे थे। आखिरकार महिलाओं की मेहनत रंग लाई। करीब डेढ़ दशक बाद गांव से महज आधा किलोमीटर की दूरी पर चीड़ के बीच बांज का जंगल खड़ा हो गया है। पूर्व ग्राम प्रधान तेजवीर कंडेरी ने महिलाओं के इस संकल्प की सराहना की।
गांव के समीप ही चीड़ के जंगल का फैलाव हो रहा था। महिलाओं ने चीड़ के बीच बांज का जंगल खड़ा करने का संकल्प लिया। आज हरे भरे बांज के जंगल को देख मन में उत्साह का संचार होता है। - सतेश्वरी देवी, पूर्व प्रधान, मंगरोली।
मंगरोली गांव की महिलाओं ने बांज का जंगल खड़ा कर एक मिसाल पेश की है। बांज जल और पर्यावरण संरक्षण के लिए काफी अहम माना जाता है। जंगल के संरक्षण के लिए पूरे प्रयास किए जाएंगे। - डॉ. हिमानी वैष्णव, अध्यक्ष, नगर पंचायत, नंदप्रयाग।