सलूड़-डुंग्रा गांव में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला दो दिवसीय रम्माण मेला शनिवार को संपन्न हुआ। मेले में पौराणिक शैली में ढोल-दमाऊं की थाप पर राम जन्म से लेकर रावण वध तक का मंचन किया गया। इस अनूठी लोक कला को करीब से देखने के लिए ग्रामीणों के साथ ही राज्य के बाहरी क्षेत्रों से भी लोग आए।
सलूड़ गांव के क्षेत्रपाल मंदिर में आयोजित रम्माण मेले का शुभारंभ जोशीमठ के उपजिलाधिकारी शैलेंद्र नेगी ने किया। उन्होंने कहा कि जोशीमठ क्षेत्र संपूर्ण प्रदेश की संस्कृति का ध्वज वाहक है। उन्होंने रम्माण को दिल्ली में गणतंत्र दिवस की परेड में प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने पर बधाई दी।
रम्माण मेला अपनी विशिष्टता के कारण विश्व धरोहरों में शुमार हुआ है। मेले का आकर्षण जागर, ढोल-दमाऊं की 18 तालें और मुखौटा नृत्य है। यह आयोजन बृहस्पतिवार रात्रि से शुरू हुआ। जो शनिवार को देर सांय नृसिंह और प्रह्लाद नृत्य नाटिका के साथ संपन्न हुआ।
भूम्याल देवता पश्वा पर अवतरित होकर क्षेत्र में खुशहाली और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। रम्माण समन्वयक डॉ. कुशल भंडारी ने कहा कि रम्माण को विश्व धरोहर का सम्मान मिलने से उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को विश्व में पहचान मिली है। इस मौके पर ब्लॉक प्रमुख प्रकाश रावत, पूर्व जिला पंचायत सदस्य भरत सिंह कुंवर, हरीश भंडारी, प्रकाश भंडारी आदि मौजूद थे।
रम्माण पर बनाई जा रही डॉक्यूमेंट्री
जोशीमठ। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की दस सदस्यीय टीम पिछले दस दिनों से रम्माण पर डॉक्यूमेंट्री तैयार कर रही है। पौराणिक रम्माण के धार्मिक क्रिया-कलाप बैशाखी के दिन से शुरू हो जाते हैं, जो रम्माण मेला आयोजन के बाद संपन्न हो जाता है। कला केंद्र की ओर से रम्माण के संरक्षण के लिए जागर, मुखौटे, रम्माण की वेशभूषा का संरक्षण भी किया जा रहा है।