सलूड़ गांव में विश्व धरोहर रम्माण मेले का सांकेतिक रूप से आयोजन हुआ। इस दौरान क्षेत्र के भूमियाल देवता की विधिवत रूप से पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद ढोल दमाऊं की थाप पर मुखौटा नृत्य के जरिए रामलीला का मंचन हुआ, जिसमें गांव के मुख्य लोग ही शामिल हुए।
कोरोना संक्रमण के कारण लगातार दूसरे साल भी रम्माण मेले का भव्य आयोजन नहीं हुआ है। पैनखंडा क्षेत्र में आठवीं सदी से आयोजित हो रहे रम्माण मेले को वर्ष 2009 में यूनेस्को की ओर से विश्व धरोहर में शामिल किया गया था। मेले का मुख्य आकर्षण यहां होने वाला मुखौटा नृत्य है। मुखौटा नृत्य के माध्यम से यहां लोक कलाकार ढोल की थाप पर 18 तालों पर भगवान राम की लीलाओं का प्रदर्शन करते हैं। क्षेत्र में बैसाखी पर्व पर भूमियाल देवता की पूजा के साथ रम्माण का आयोजन भी शुरू हो जाता है, जिसके बाद भूमियाल देवता क्षेत्र में भ्रमण करते हैं। भ्रमण के दौरान गांव में प्रत्येक दिन रात्रि के समय मुखौटा नृत्य करते हैं। धार्मिक अनुष्ठान के अंतिम दिन रम्माण मेले का आयोजन होता है। बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले क्षेत्र में यह आयोजन बड़े धूमधाम से होता है जिसमें शामिल होने के लिए बाहरी क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग सलूड़ गांव पहुंचते हैं, लेकिन दो सालों से कोरोना संक्रमण के चलते रम्माण मेले का आयोजन नहीं किया जा सकता है। शुक्रवार को रम्माण का आयोजन सांकेतिक रूप से किया गया। रम्माण मेले के संयोजक डा. कुशल सिंह भंडारी का कहना है कि इस वर्ष कोविड के बढ़ते प्रकोप के चलते रम्माण का आयोजन सूक्ष्म रूप में किया गया, जिसमें गांव के मुख्य लोग ही शामिल हुए हैं।