गढ़वाली और कुमाऊंनी बोली को आठवीं अनुच्छेद में शामिल करने और भाषा का दर्जा देने को लेकर विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं की ओर से चल रहा संघर्ष कभी भी जनांदोलन में तब्दील हो जाएगा।
गोपेश्वर पहुंचे कलश साहित्यिक संस्था एवं लोक भाषा साहित्य समिति के अध्यक्ष ओम प्रकाश सेमवाल ने यहां आयोजित पत्रकार वार्ता में कहा कि गढ़वाली और कुमाऊंनी बोली में पर्याप्त साहित्य का सृजन किया जा चुका है।
इन दोनों बोलियों में पर्याप्त शब्दकोष और व्याकरण है, लेकिन सरकार की ओर से गढ़वाली और कुमाऊंनी बोली को भाषा का दर्जा दिए जाने में कोई सकारात्मक पहल नहीं की जा रही है। साहित्यिक संस्था धाद, कलश और लोक भाषा समिति के साथ ही कई संस्थाएं गढ़वाली-कुमाऊंनी को भाषा का दर्जा देने को लेकर संघर्ष कर रही हैं।
जल्द ही यह संघर्ष जनांदोलन में तब्दील हो जाएगा। गढ़वाली-कुमाऊंनी बोली भी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। इस मौके पर कवि सुधीर बर्त्वाल, मुरली दीवान, जगदंबा चमोला, तेजपाल निर्मोही, नंदन राणा, डा. शैलेंद्र मैठाणी, मनमोहन भट्ट और शशि देवली आदि मौजूद थे।