चिपको आंदोलन के 50 साल पूरे होने पर दशोली ग्राम स्वराज मंडल व चंडी प्रसाद भट्ट पर्यावरण विकास केंद्र की ओर से सर्वोदय परिसर में बैठक आयोजित की गई। इस दौरान चिपको आंदोलन के पुरोधाओं को याद करते हुए वक्ताओं ने कहा कि पर्यावरण बचाने के लिए 50 साल पहले जो मुहिम चली थी वह आज भी जारी है। इसे और तेज करने की जरूरत पर जोर दिया गया।
बैठक में चिपको के प्रेणता व पदम विभूषण से सम्मानित पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट ने कहा कि एक अप्रैल 1973 को मंडल घाटी के जंगलों को बचाने के लिए पहली बार चिपको आंदोलन का निर्णय लिया गया था। उन्होंने पर्यावरण बचाने के लिए चले चिपको आंदोलन का सिलसिलेवार वर्णन किया। रैणी गांव के जंगलों को बचाने के लिए एक जनवरी 1974 को चंडी प्रसाद भट्ट, गोविंद रावत, वासवानंद नौटियाल और हयात सिंह ने गांव का भ्रमण कर गोष्ठियां की। 26 मार्च 1974 को रैणी के जंगल में कंपनी के मजदूरों से पेड़ों को बचाने के लिए गौरा देवी के नेतृत्व में महिलाएं पेड़ पर चिपक गई, जिसका परिणाम यह हुआ कि रैणी गांव का जंगल बच गया। बैठक में वक्ताओं ने कहा कि आज भी इसी तरह के आंदोलन की जरूरत है। लगातार वनों में लगने वाली आग पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचा रही है इसका पता मौसम में आ रहे बदलाव से लगाया जा सकता है। कहा कि चिपको आंदोलन को स्थानीय स्तर पर मिले सहयोग से सफल किया गया था।