पहाड़ी क्षेत्रों में बहुतायत मात्रा में पाए जाने वाले बुंराश के फूल इस बार अपनी मिठास देने से पहले ही मुरझा गए हैं। लॉकडाउन के दौरान लोग जंगलों में बुरांश लेने नहीं जा पा पाए और संस्थान भी हैं। ऐसे में गर्मियों में लोगों को बुरांश का जूस नहीं मिलेगा।
कर्णप्रयाग तहसील के बेनीताल, खंडूड़ा, रतूड़ा, धारकोट, ऐरवाड़ी, सिमतोली, सेम, नंदासैंण, पुडियाणी, एंड सहित कई ऊंचाई वाले गांवों के जंगलों में बुरांश के हजारों पेड़ पाए जाते हैं। अप्रैल माह में ग्रामीण बुरांश के पेड़ों से फूल तोड़कर एकत्र करते हैं और बाजार में लाकर जूस बनाते हैं। रतूड़ा गांव के भरत प्रसाद, राजेश, उमेश, विजय आदि ने कहा कि कई लोग बुरांश के जूस से अपनी आर्थिकी भी चलाते हैं, लेकिन इस बार सरकारी व निजी जूस बनाने वाले संस्थान बंद होने, वाहन न चलने और लॉकडाउन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के लोग जंगलों से बुरांश के फूलों को समय पर नहीं तोड़ पाए। बुरांश बुखार, खांसी, हृदय रोग, ब्लड प्रेशर, लीवर के रोगियों के लिए लाभदायक होता है। रतूड़ा गांव के भरत प्रसाद, राजेश, उमेश, विजय आदि का कहना है कि हजारों पेड़ों पर बुरांश के फूल मुरझाने से इस बार गांवों में लोग जूस नहीं बना पाये।
बुरांश के औषधीय गुण
बुरांश के पेड़ समुद्र तल से करीब 1250 से 2000 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं। बुरांश बुखार, खांसी, ह्दय रोग, ब्लड प्रेशर, लीवर के रोगियों के लिए लाभदायक होता है। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में लाल रंग का बुरांश पाया जाता है। जबकि यह सफेद और नीले रंगा का भी होता है। उत्तराखंड और हिमांचल प्रदेश में बुरांश के फूलों का जूस, मुरब्बा, चटनी बनाया जाता है। चीन, नेपाल और भूटान में भी बुरांश काफी मात्रा में पाया जाता है।
चीड़ के बढ़ते प्रभाव ने बढ़ाई चिंता
पहाड़ी क्षेत्रों के जंगलों में चीड़ की घुसपैठ से बुरांश, काफल, अंगियार, बांज आदि चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों की संख्या सिमटती जा रही है। गर्मियों में चीड़ के पीरूल पर आग लगने से बुरांश के पेड़ों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंच रहा है। हालांकि इस बार लॉकडाउन के चलते लोग बुरांश के फूल नहीं तोड़ पाए और फूल परिपक्व होने के बाद फिर से जंगलों में बिखर गए हैं। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि यदि जंगलों में आग न लगे तो बुरांश के पौधों में बढ़ोतरी हो सकती है।