रैणी गांव के काली मंदिर में इस बार पशु बलि नहीं दी गई। यह पहला मौका है जब चैत्र नवरात्र में ग्रामीणों ने पशु बलि के बजाय श्रीफल और अन्न का भोग लगाकर मां काली की पूजा की। अब से ग्रामीणों ले मंदिर में पशुबलि के बजाय श्रीफल और भोग लगाकर ही पूजा करने का निर्णय लिया है।
जोशीमठ-मलारी हाईवे पर धौली गंगा के किनारे दक्षिणमुखी मां काली का मंदिर है। नवरात्र के साथ ही अन्य धार्मिक आयोजनों में यहां मनोकामना पूर्ण होने पर मंदिर में पशु बलि देने की परंपरा थी। बीते वर्ष नवंबर माह तक मंदिर में पशु बलि हुई। मंदिर दूरस्थ क्षेत्र में होने के कारण प्रशासन को इसकी भनक नहीं लग सकी। शारदीय नवरात्र के बाद नवंबर माह में ही ग्रामीणों ने एक बैठक कर बदलते परिवेश को देखते हुए मंदिर में पशुबलि न करने का संकल्प लिया।
इसके लिए ग्रामीणों ने मां काली के पश्वा से भी सहमति ली। इस तरह इस बार मंदिर में आयोजित चैत्र नवरात्र में पहली बार मंदिर में पशुबलि नहीं हुई। रैणी मंदिर समिति के अध्यक्ष मोहन सिंह रावत का कहना है कि मां काली की अनुमति पर ही अब मंदिर में श्रीफल और अन्न का भोग माता को अर्पित किया गया। आगे भी इसी परंपरा का निर्वहन किया जाएगा।