कर्णप्रयाग। प्रभु श्रीराम के दरबार (रामलीला) में प्रसाद के रूप में रंग का टीका और शिव के मंदिर में भगवान के साथ गीली होली की परंपरा डिम्मर गांव में सदियों से चली आ रही है। दो दिवसीय होली में ग्रामीण देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के साथ सामूहिक भोग करते हैं। इस त्योहार में गांव के सभी बड़े, बुजुर्ग और महिलाएं शामिल होती हैं।
डिम्मर गांव में होली भक्त और भगवान एक साथ मनाते हैं। बैठकी होली के दिन जहां श्रीलक्ष्मी-नारायण मंदिर में भगवान श्रीबदरीनाथ जी की धार्मिक अनुष्ठान के साथ पूजा की जाती है। वहीं रंग का टीका भी लगाया जाता है। इसके बाद गांव की पंचायती चौंरी में समस्त ग्रामीणों को होली का टीका लगाते हैं जिसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। रात्रि को होलिका दहन करते हैं उसकी राख को लेकर होल्यार सिद्धपीठ टटेश्वर मंदिर पहुंचते हैं। यहां आराध्य भगवान शिव के साथ होली खेली जाती है। इसके बाद सामूहिक भोग तैयार होता है, जिसे वैदिक मंत्रोच्चार से भगवान को चढ़ाया जाता है। इसके बाद सभी ग्रामीण एकसाथ बैठकर भोग ग्रहण करते हैं। दो दिवसीय होली के लिए रंगों की व्यवस्था रामलीला कमेटी करती है।
डिम्मर गांव की होली ऐतिहासिक है। इस मौके पर भक्त और भगवान के बीच में रंगों का उल्लास देखते ही बनता है। रामलीला और होली एक साथ होने से इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है। - एसपी डिमरी/डीपी डिमरी/एमपी डिमरी, निवासी डिम्मर।