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जंगलों में लग रही आग से पर्यावरण हो रहा प्रदूषित

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कर्णप्रयाग। पहाड़ी क्षेत्रों में अत्यधिक मात्रा में पाये जाने वाले बांज, मोरू, खरसू, बुरांश, काफल, अगिंयार, फनियाट के जंगलों में चीड़ के पेड़ों की बढ़ती संख्या से इन बहुउपयोगी वनों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। पर्यावरणविद् तथा वनस्पति वैज्ञानिक इन जीवनदायी वनों की घटती संख्या से चिंतित हैं। उनका कहना है कि वरुणावत तथा दयूड़ी डांडा में हो रहे भूस्खलन का मुख्य कारण चीड़ के जंगल हैं। कर्णप्रयाग ब्लाक के जाख, कलियाड़ी, भटग्वाली, नंदासैंण, जखेट, खेती, पिंडवाली, बडेत, छांतोली, पुनगांव, बिसोंणा, किरसाल, मजियाड़ी, भलसों, गिंवाड़, बेड़ी, छिमटा, बेनीताल, चोंडली के जंगलों में लगातार चीड़ के पौधों की संख्या बढ़ रही है। चीड़ की जड़ से निकलने वाला एलीलोपैथी रसायन और पत्तियों में लिगिनिग की मात्रा ज्यादा होने से पीरूल सड़ता नहीं है, जिससे चीड़ के पेड़ों के नीचे नई वनस्पतियां जम नहीं पाती हैं।
-क्या नुकसान हैं चीड़ से
वैज्ञानिक बताते है कि चीड़ का एक वयस्क पेड़ जमीन से प्रतिदिन 54 लीटर पानी खींचता है जबकि वाष्पीकरण की मात्रा शून्य है। जिससे जलस्रोत सूख रहे हैं। अन्य पैदावार भी समाप्त हो रही है और घास की कमी भी हो रही है। इससे जंगलों में आग लगने का खतरा भी बना रहता है।
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क्या फायदे हैं चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों से
बांज का पेड़ प्रतिदिन 12 लीटर पानी का वाष्पीकरण करता है, जबकि भूमि से एक बूंद भी पानी नहीं लेता है। जल स्तर में बढ़ोतरी करता है और भूस्खलन रोकता है।
क्या कहते हैं पर्यावरणविद्
जाने-माने पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट कहते हैं कि चीड़ की बेहताशा बढ़ोतरी ने पर्यावरण को खासा नुकसान पहुंचाया है। जंगलों में खाली स्थानों में बांज के पौधे लगाने चाहिए। नई पीढ़ी को जागरूक होकर चौड़ी पत्ती वाले वनों की उपयोगिता को समझना होगा। लगातार बढ़ रहे धरती के तापमान एवं मौसम में हो रहे परिवर्तन का असर हमारी वनस्पतियों पर देखा जा रहा है। इससे भी वनों का विकास और विस्तार प्रभावित हो रहा है।
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